सरकार का 'हाइपर-स्पीड' एक्शन प्लान
केंद्र सरकार ने AI-जनरेटेड कंटेंट पर लगाम कसने के लिए नए नियम जारी किए हैं, जिनका सबसे बड़ा असर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पड़ेगा। सबसे खास बात यह है कि अब प्लेटफॉर्म्स को सरकार के कंटेंट हटाने के आदेशों पर तीन घंटे के भीतर ही एक्शन लेना होगा। वहीं, गैर-सहमति वाले आपत्तिजनक वीडियो (non-consensual nude imagery) के मामले में यह समय सीमा और भी कड़ाकर दो घंटे कर दी गई है। सरकार का कहना है कि यह तेजी वायरल हो रहे डीपफेक (deepfake) और गलत सूचनाओं (misinformation) से होने वाले नुकसान को तुरंत रोकने के लिए जरूरी है। लेकिन, डिजिटल पॉलिसी एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तेजी से प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट हटाने का दबाव बढ़ेगा, जिससे वे 'अति-अनुपालन' (over-compliance) कर सकते हैं और मामलों की ठीक से जांच किए बिना ही कंटेंट हटा सकते हैं।
कार्रवाई का दबाव और 'जल्दी हटाना बेहतर' की सोच
इतने कम समय में किसी भी कंटेंट की कानूनी या तथ्यात्मक जांच करना मुश्किल माना जा रहा है। कई बड़ी ग्लोबल प्लेटफॉर्म्स के मॉडरेशन सेंटर भारत के बाहर हैं, जिससे उन्हें 24x7 घरेलू कम्प्लायंस इंफ्रास्ट्रक्चर (compliance infrastructure) खड़ा करना पड़ेगा। इससे कंपनियों के ऑपरेशनल खर्चे बढ़ेंगे और छोटे प्लेटफॉर्म्स या स्टार्टअप्स के लिए बाजार में टिके रहना और भी मुश्किल हो सकता है। रेगुलेटरी एक्शन से बचने के लिए, प्लेटफॉर्म्स पर 'सुरक्षा को पहले' (better safe than sorry) की सोच हावी हो सकती है, जिससे वे जल्दबाजी में लीगल नोटिस की लॉफुलनेस (lawfulness) या प्रोपोर्शनैलिटी (proportionality) जांचे बिना ही कंटेंट हटा सकते हैं। इस 'ओवर-कम्प्लायंस' का सीधा असर ऑनलाइन चर्चाओं और अभिव्यक्ति की आजादी पर पड़ सकता है।
'सेफ हार्बर' पर खतरा
ये कड़े नियम प्लेटफॉर्म्स के लिए 'सेफ हार्बर' (safe harbour) प्रोविजन्स को सीधे तौर पर चुनौती दे रहे हैं। सेफ हार्बर नियमों के तहत, प्लेटफॉर्म्स को थर्ड-पार्टी कंटेंट के लिए तब लीगल इम्युनिटी (legal immunity) मिलती है, जब वे ड्यू डिलिजेंस (due diligence) का पालन करते हैं। लेकिन, इन तेज टेकडाउन समय-सीमाओं को पूरा न कर पाने पर यह सुरक्षा छिन सकती है। जानकारों का कहना है कि सेफ हार्बर खोने के जोखिम के आगे कंटेंट हटाने की लागत कम लगेगी, जिससे प्लेटफॉर्म्स तेजी से ऑटोमेटेड (automated) रिमूवल की ओर बढ़ेंगे। इसके अलावा, 'सहयोग' (Sahyog) पोर्टल का दायरा बढ़ने से कई राज्य स्तरीय अथॉरिटीज (state-level authorities) एक साथ टेकडाउन नोटिस भेज सकती हैं, जिससे प्लेटफॉर्म्स पर काम का बोझ बढ़ेगा और अनजाने में या गलत तरीके से कंटेंट पर रोक लग सकती है।
वैश्विक संदर्भ और अनपेक्षित नतीजे
दुनिया भर में AI रेगुलेशन पर बहस चल रही है, लेकिन भारत का तीन घंटे का टेकडाउन मैंडेट (mandate) अपनी अत्यधिक गति के लिए अलग खड़ा है। यूरोपीय यूनियन (European Union) जैसे कई देशों में प्लेटफॉर्म्स को कंटेंट की जांच और जवाब देने के लिए काफी लंबा समय मिलता है, जिसमें अपील और न्यायिक समीक्षा (judicial oversight) के भी प्रावधान हैं। आलोचकों का तर्क है कि भारत का यह कदम संसदीय बहस के बजाय सिर्फ एग्जीक्यूटिव नोटिफिकेशन (executive notification) के जरिए लाया गया है, जिससे पारदर्शिता और विचार-विमर्श की कमी है। सरकार का लक्ष्य भले ही डीपफेक और भ्रामक AI कंटेंट को रोकना हो, लेकिन इस तेज रफ्तार से सामान्य AI एप्लीकेशन्स और यूजर-जनरेटेड कंटेंट पर भी अनपेक्षित असर पड़ सकता है, जो भारत के डिजिटल इनोवेशन हब बनने के सपने के आड़े आ सकता है।
