खेती की सुरक्षा और टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ता कदम
भारत और अमेरिका के बीच हालिया अंतरिम व्यापार समझौते (interim trade agreement) में एक अहम रणनीतिक बदलाव देखा जा रहा है। यह डील, खेती के कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में सीमित छूट के बदले, उच्च-विकास वाले टेक्नोलॉजी और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए दरवाजे खोलती है। जहां घरेलू कृषि हितों की सुरक्षा सर्वोपरि है, वहीं इस समझौते का मुख्य उद्देश्य भारत की डिजिटल क्रांति के लिए आवश्यक एडवांस्ड सेमीकंडक्टर चिप्स (advanced semiconductor chips) और महत्वपूर्ण तकनीकों (critical technologies) तक भारत की पहुंच को तेज करना है।
डिजिटल महत्वाकांक्षाओं के लिए टेक्नोलॉजी का मार्ग प्रशस्त
इस डील का एक बड़ा तत्काल लाभ भारत की तकनीकी क्षमताओं को बढ़ावा देना है। एडवांस्ड सेमीकंडक्टर चिप्स, सर्वर कंपोनेंट्स और महत्वपूर्ण तकनीकों तक पहुंच हासिल करके, यह समझौता भारत की 'डिजिटल इंडिया' पहल और हाई-परफॉरमेंस कंप्यूटिंग (High-performance computing) की खोज को गति देगा। यह ऐसे समय में हो रहा है जब ग्लोबल सेमीकंडक्टर मार्केट के $670 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। इसके अलावा, इस डील से अमेरिकी सरकार द्वारा कुछ भारतीय विमानों और ऑटो पार्ट्स पर लगाए गए सेक्शन 232 टैरिफ (Section 232 tariffs) को हटा दिया गया है। यह ऑटोमोटिव कंपोनेंट्स के लिए तरजीही टैरिफ दर (preferential tariff rate) भी प्रदान करता है, जिससे भारतीय औद्योगिक निर्यातकों को राहत मिलेगी और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।
सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा
भारत अपनी 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' (India Semiconductor Mission - ISM) के फेज 2.0 के माध्यम से अपने सेमीकंडक्टर उद्योग को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। ISM का लक्ष्य भारत को एक ग्लोबल हब बनाना है, और यह व्यापार डील महत्वपूर्ण तकनीकों तक पहुंच को आसान बनाकर इस लक्ष्य में सहायक है। हालांकि, भारत को ताइवान जैसे स्थापित खिलाड़ियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, जो वैश्विक फाउंड्री रेवेन्यू में अग्रणी है। कई देश अपनी घरेलू चिप मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं भी विकसित कर रहे हैं। AI और एडवांस्ड कंप्यूटिंग से प्रेरित होकर ग्लोबल सेमीकंडक्टर मार्केट के बढ़ने की उम्मीद है, ऐसे में भारत के लिए अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करना महत्वपूर्ण होगा।
कृषि क्षेत्र और बाजार पहुंच की चिंताएं
कृषि के मोर्चे पर, इस डील में चावल, गेहूं, पोल्ट्री और डेयरी जैसे प्रमुख घरेलू उत्पादों को टैरिफ परिवर्तनों से बचाने के लिए एक 'एक्सक्लूजन कैटेगरी' (Exclusion Category) बनाई गई है। भारत ने जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) उत्पादों पर भी प्रतिबंध बनाए रखे हैं। जहां भारत को मसालों, चाय और कॉफी जैसे कुछ निर्यात पर ड्यूटी-फ्री पहुंच मिली है, वहीं अमेरिका से कुछ आयातों पर कम शुल्क (lower duties) के प्रभाव को लेकर चिंताएं भी हैं। उदाहरण के लिए, अधिक अमेरिकी सोयाबीन तेल (soybean oil) और ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स विद सोल्यूबल्स (DDGS) की अनुमति से भारतीय सोयाबीन किसानों और पोल्ट्री क्षेत्र पर दबाव पड़ सकता है, जो इन सामग्रियों का फीड के तौर पर उपयोग करते हैं। 2024 में, भारत का अमेरिका के साथ कृषि व्यापार में $1.3 बिलियन का व्यापार अधिशेष (trade surplus) था।
व्यापार टैरिफ और नीतिगत पहलू
इस अंतरिम समझौते के तहत, अमेरिकी माल पर टैरिफ दर को 2025 में व्यापार तनाव के दौरान 50% तक पहुंचने से घटाकर 18% कर दिया गया है। इससे पहले, अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए सेक्शन 232 टैरिफ का उपयोग किया था, जिसका असर स्टील और एल्युमीनियम जैसे क्षेत्रों पर पड़ा था। यह व्यापार समझौता ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिकी व्यापार नीति अधिक ट्रांजेक्शनल (transactional) होती जा रही है, जिसे कुछ विश्लेषक भारत और अन्य देशों के लिए भू-राजनीतिक जोखिम (geopolitical risks) पैदा करने वाला मानते हैं। 2024 में, भारत का अमेरिका के साथ कुल द्विपक्षीय व्यापार (bilateral trade) लगभग $212 बिलियन था।
आगे की राह
इस अंतरिम डील को एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) की ओर एक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जिसका लक्ष्य एक अधिक एकीकृत डिजिटल अर्थव्यवस्था (digital economy) बनाना और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (global supply chains) में भारत की भूमिका को बढ़ाना है। विश्लेषक AI और हाई-परफॉरमेंस कंप्यूटिंग द्वारा संचालित ग्लोबल सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में मजबूत वृद्धि की ओर इशारा करते हैं, जिससे इस क्षेत्र पर भारत का ध्यान रणनीतिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपनी कृषि सुरक्षा को तकनीकी स्वतंत्रता की अपनी खोज के साथ कैसे संतुलित करता है और अमेरिकी व्यापार नीति की जटिलताओं का प्रबंधन कैसे करता है।