भारत का चिप भविष्य: अब सिर्फ निर्माण नहीं, 'दिमाग' पर जोर! बजट में ₹40,000 करोड़ का बड़ा ऐलान

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत का चिप भविष्य: अब सिर्फ निर्माण नहीं, 'दिमाग' पर जोर! बजट में ₹40,000 करोड़ का बड़ा ऐलान
Overview

भारत सरकार ने अपने बजट 2026-27 में देश के सेमीकंडक्टर (Semiconductor) इकोसिस्टम को नई दिशा दी है। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 को लॉन्च किया गया है और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) का दायरा बढ़ाकर **₹40,000 करोड़** कर दिया गया है। यह कदम अब केवल चिप फैब्रिकेशन (Fabrication) पर नहीं, बल्कि स्वदेशी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) और एक फुल-स्टैक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने पर ज़ोर देगा।

ISM 1.0 से ISM 2.0 तक: एक बड़ा रणनीतिक बदलाव

भारत के लिए यह बजट 2026-27 एक बड़ी रणनीतिक छलांग लेकर आया है। सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 को औपचारिक रूप से लॉन्च किया है और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) के लिए फंड को ₹40,000 करोड़ तक बढ़ा दिया है। यह पहल देश को केवल 'असेंबली' पर निर्भर रहने के बजाय, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) पर आधारित एक मजबूत और समग्र सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने की ओर ले जा रही है। यह समझना ज़रूरी है कि ग्लोबल डिजिटल इकोनॉमी में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पूरे वैल्यू चेन (Value Chain) में महारत हासिल करना ज़रूरी है। यह बदलाव AI, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) और अगली पीढ़ी के कम्युनिकेशन सिस्टम्स (Communication Systems) जैसी तकनीकों की बढ़ती मांग के बीच और भी अहम हो जाता है।

ISM 2.0 का फोकस: गैप्स को भरना

दिसंबर 2021 में ₹76,000 करोड़ के बजट के साथ शुरू हुए ISM 1.0 ने फैब्रिकेशन और असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग (ATMP) सुविधाओं में बड़े निवेश को आकर्षित करने में सफलता पाई थी। हालांकि, इसका असर मुख्य रूप से डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित रहा। क्रिटिकल अपस्ट्रीम सेगमेंट, जैसे फैब्रिकेशन इक्विपमेंट (Fabrication Equipment) और स्पेशियलिटी मैटेरियल्स (Specialty Materials), काफी हद तक आयात पर निर्भर रहे। ISM 2.0 सीधे तौर पर इस कमी को दूर करता है। यह मैन्युफैक्चरिंग को डिज़ाइन, मैटेरियल्स, इक्विपमेंट और इंस्टीट्यूशनल कैपेबिलिटीज़ (Institutional Capabilities) को शामिल करते हुए एक व्यापक फ्रेमवर्क में एकीकृत (Integrate) करता है। अब बजट का आवंटन डोमेस्टिक प्रोडक्शन ऑफ इक्विपमेंट (Domestic Production of Equipment) और मैटेरियल्स, फुल-स्टैक इंडियन IP के विकास, और इंडस्ट्री-लेड रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (Research and Training Infrastructure) की स्थापना पर केंद्रित होगा। यह एकीकृत दृष्टिकोण सप्लाई-चेन रेज़िलिएंस (Supply-Chain Resilience) को मज़बूत करेगा और भारत को ग्लोबल सेमीकंडक्टर मार्केट में एक मजबूत खिलाड़ी के तौर पर स्थापित करेगा।

ECMS का विस्तार: कंपोनेंट्स की मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा

₹40,000 करोड़ के विस्तारित ECMS का इस इकोसिस्टम को बनाने में केंद्रीय रोल है। मूल रूप से अप्रैल 2025 में ₹22,919 करोड़ के आवंटन के साथ शुरू हुई इस स्कीम ने पहले ही निवेश के शुरुआती अनुमानों को पार कर लिया था, जिसने सरकार को फंड आवंटन बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। यह बढ़ी हुई ECMS, सेमीकंडक्टर प्रोडक्शन के लिए ज़रूरी कंपोनेंट्स (Components) और स्पेशलाइज्ड मैटेरियल्स (Specialized Materials) जैसे केमिकल्स (Chemicals), गैसेस (Gases), वेफर्स (Wafers), प्रिसिजन मशीनरी (Precision Machinery) और एडवांस्ड पैकेजिंग सर्विसेज़ (Advanced Packaging Services) की डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देगी। कंपोनेंट इकोसिस्टम को मज़बूत करना आयात पर निर्भरता कम करने और भारत के मैन्युफैक्चरिंग बेस को ग्लोबल वैल्यू चेन्स में गहराई से एकीकृत करने के लिए महत्वपूर्ण है।

ग्लोबल परिदृश्य और पिछली सीख

सेमीकंडक्टर अब सिर्फ कंपोनेंट्स नहीं रह गए हैं, बल्कि नेशनल सिक्योरिटी (National Security) और इकोनॉमिक रेज़िलिएंस (Economic Resilience) के लिए एक स्ट्रेटेजिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Strategic Infrastructure) बन गए हैं। ये डिफेंस (Defense), क्लीन एनर्जी (Clean Energy), AI और क्लाउड कंप्यूटिंग (Cloud Computing) जैसे सेक्टर्स को पावर देते हैं। ग्लोबल सेमीकंडक्टर रेस (Global Semiconductor Race) तेज़ हो रही है, जिसमें प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अपनी सप्लाई चेन्स को सुरक्षित करने और डोमेस्टिक कैपेबिलिटीज (Domestic Capabilities) को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका के CHIPS Act और EU Chips Act जैसे बड़े प्रोत्साहन कार्यक्रम चला रही हैं। ISM 2.0 के ज़रिए, भारत एक भरोसेमंद वैकल्पिक हब (Alternative Hub) बनने की राह पर है, जिसका लक्ष्य इंजीनियरिंग टैलेंट (Engineering Talent) और बढ़ती डिजिटल इकोनॉमी (Digital Economy) का लाभ उठाकर कुछ मैन्युफैक्चरिंग सेंटर्स पर ग्लोबल निर्भरता कम करना है। ऐतिहासिक रूप से, भारत के सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में मज़बूत नींव बनाने के प्रयासों को पॉलिसी में असंगति (Policy Inconsistency) और इकोसिस्टम के फाउंडेशनल एलिमेंट्स (Foundational Elements) पर फोकस की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। पिछली कोशिशें अक्सर फैब्रिकेशन यूनिट्स को आकर्षित करने पर केंद्रित थीं, बिना सपोर्टिंग सप्लाई चेन फॉर मैटेरियल्स एंड इक्विपमेंट (Supporting Supply Chain for Materials and Equipment) को विकसित किए। ISM 2.0 का IP और फुल-स्टैक अप्रोच इन पिछली कमियों को दूर करने और एक सस्टेनेबल, कॉम्पिटिटिव इंडस्ट्री बनाने का प्रयास करता है।

इकोसिस्टम डोमिनेंस की राह में चुनौतियाँ (Forensic Bear Case)

इस महत्वाकांक्षी बदलाव के बावजूद, भारत के सेमीकंडक्टर सेल्फ-रिलायंस (Self-Reliance) के रास्ते में महत्वपूर्ण चुनौतियाँ बनी हुई हैं। एक व्यापक IP इकोसिस्टम का विकास स्वाभाविक रूप से जटिल और कैपिटल-इंटेंसिव (Capital-Intensive) है, जिसके लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में निरंतर निवेश और एक मज़बूत टैलेंट पाइपलाइन (Talent Pipeline) की ज़रूरत है। भारत अभी भी एडवांस्ड फैब्रिकेशन नोड्स (Advanced Fabrication Nodes) (सब-10nm) में टेक्नोलॉजी गैप (Technology Gap) का सामना कर रहा है, और अत्याधुनिक तकनीकों के लिए वैश्विक लीडर्स पर निर्भर है। क्रिटिकल इनपुट्स जैसे हाई-प्योरिटी केमिकल्स (High-Purity Chemicals) और स्पेशियलिटी गैसेस (Specialty Gases) के लिए देश की 90% से अधिक आयात निर्भरता, एक पूरी तरह से डोमेस्टिक सप्लाई चेन बनाने की लंबी राह को दर्शाती है। इसके अलावा, पिछली पॉलिसी इम्प्लीमेंटेशन (Policy Implementation) से पता चलता है कि सरकारी सब्सिडी (Government Subsidies) हासिल करना और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क्स (Regulatory Frameworks) को नेविगेट करना एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है। तीव्र ग्लोबल कॉम्पिटिशन (Global Competition) और चिप सप्लाई चेन्स का 'वेपनाइज़ेशन' (Weaponization) भू-राजनीतिक जोखिमों (Geopolitical Risks) को बढ़ाता है। जबकि ISM 2.0 R&D और IP पर केंद्रित है, चिप डिज़ाइन के लिए मास्क सेट्स (Mask Sets) की लागत एक महत्वपूर्ण बाधा हो सकती है, जबकि चीन जैसे देश अपने डोमेस्टिक फर्म्स को भारी कैपिटल सपोर्ट (Capital Support) दे रहे हैं। डिज़ाइन, मैटेरियल्स साइंस (Materials Science) और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग (Advanced Manufacturing) में अत्यधिक स्पेशलाइज्ड टैलेंट को आकर्षित करना और बनाए रखना, इंजीनियरों के एक बड़े पूल के बावजूद, एक लगातार चिंता का विषय बना हुआ है।

भविष्य का दृष्टिकोण

ISM 2.0 और विस्तारित ECMS एक अधिक एकीकृत और संस्थागत रूप से एंकर्ड पॉलिसी फ्रेमवर्क (Institutionally Anchored Policy Framework) का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिस्कल सपोर्ट (Fiscal Support) को R&D, डिज़ाइन, स्किलिंग (Skilling) और सप्लायर डेवलपमेंट (Supplier Development) के उपायों के साथ जोड़कर, सरकार एक संतुलित और सस्टेनेबल सेमीकंडक्टर फ्रेमवर्क बनाने का लक्ष्य रखती है। कंसेशनल कस्टम ड्यूटी रेजीम (Concessional Customs Duty Regimes) की निरंतरता और क्लस्टर-आधारित डेवलपमेंट (Cluster-based Development) को बढ़ावा देना भी प्रोजेक्ट वायबिलिटी (Project Viability) को बेहतर बनाने और सप्लाई-चेन रेज़िलिएंस को बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं। भारत का सेमीकंडक्टर मार्केट घरेलू मांग और ग्लोबल अवसरों से प्रेरित होकर 2030 तक $100-$110 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। ISM 2.0 की सफलता फैब्रिकेशन कैपेसिटी (Fabrication Capacity) और एक मज़बूत, IP-रिच इकोसिस्टम के बीच के गैप को प्रभावी ढंग से पाटने, जटिल ग्लोबल डायनामिक्स (Global Dynamics) को नेविगेट करने और R&D व स्पेशलाइज्ड मैन्युफैक्चरिंग कैपेबिलिटीज में निरंतर प्राइवेट और पब्लिक इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देने पर निर्भर करेगी।

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