बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) और साइबर सुरक्षा (Cybersecurity) को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, भारत सरकार अपने महत्वपूर्ण सेक्टरों जैसे एनर्जी, टेलीकॉम और बैंकिंग के लिए 'मेड-इन-इंडिया' सॉवरेन क्लाउड सिस्टम को अनिवार्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकती है। सरकार का लक्ष्य विदेशी क्लाउड प्रोवाइडर्स पर निर्भरता कम करना और राष्ट्रीय डेटा सुरक्षा को मजबूत करना है।
इस बड़े पॉलिसी बदलाव की एक अहम वजह हाल ही में माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) और नयरा एनर्जी (Nayara Energy) के बीच हुआ मामला है। जुलाई 2025 में, यूरोपीय संघ (European Union) द्वारा नयरा एनर्जी पर रूस की रोसनेफ्ट (Rosneft) के आंशिक स्वामित्व के कारण लगाए गए प्रतिबंधों के बाद, माइक्रोसॉफ्ट ने अचानक नयरा एनर्जी की IT सर्विस सस्पेंड कर दी थी। इसमें आउटलुक (Outlook) और टीम्स (Teams) जैसी सेवाएं भी शामिल थीं, भले ही नयरा एनर्जी ने अपने लाइसेंस का भुगतान कर दिया था। नयरा एनर्जी ने इस मामले को दिल्ली हाईकोर्ट में उठाया, जिसमें उसने माइक्रोसॉफ्ट के एक्शन को गलत बताया। हालांकि कोर्ट की सुनवाई से पहले माइक्रोसॉफ्ट ने सेवाएं बहाल कर दीं, लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया कि महत्वपूर्ण डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विदेशी कंपनियों के हाथ में होने से क्या जोखिम हो सकते हैं।
हालांकि, भारत के लिए सॉवरेन क्लाउड को अनिवार्य बनाने में एक बड़ी चुनौती घरेलू क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास है। भारतीय कंपनियां अभी भी एडब्ल्यूएस (AWS), माइक्रोसॉफ्ट एज़्योर (Microsoft Azure) और गूगल क्लाउड प्लेटफॉर्म (Google Cloud Platform) जैसे ग्लोबल दिग्गजों के मुकाबले काफी पीछे हैं। TCS जैसी भारतीय आईटी कंपनियों का मार्केट कैप ₹8.86 ट्रिलियन और P/E 17.54 है, जबकि Infosys का मार्केट कैप ₹4.75 ट्रिलियन और P/E 15.8 है। वहीं, माइक्रोसॉफ्ट का मार्केट कैप $3.15 ट्रिलियन और P/E 26.58 है। इस अंतर को पाटने के लिए भारी निवेश, रिसर्च और डेवलपमेंट की जरूरत होगी। भारत का डेटा सेंटर मार्केट तेजी से बढ़ रहा है, जिसके $36.6 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, लेकिन इसमें भी विदेशी हाइपरस्केलर्स का दबदबा है।
दुनिया भर में क्लाउड मार्केट पर एडब्ल्यूएस का करीब 30-33% हिस्सा है, जिसके बाद माइक्रोसॉफ्ट का 20-25% और गूगल क्लाउड का 10-13% है। भारत में भी एडब्ल्यूएस आगे है, लेकिन माइक्रोसॉफ्ट और गूगल क्लाउड भी तेजी से बढ़ रहे हैं। भारतीय क्लाउड कंप्यूटिंग मार्केट 2026 तक लगभग ₹95 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है और 2024 में USD 14.43 बिलियन से बढ़कर 2032 तक USD 68.66 बिलियन तक पहुंच सकता है, जिसकी CAGR 21.80% रहने का अनुमान है।
ऐसे में, सॉवरेन क्लाउड मैंडेट को लागू करने में कुछ जोखिम भी हैं। स्वदेशी क्लाउड समाधानों की स्केलेबिलिटी (Scalability) और कॉस्ट-एफिशिएंसी (Cost-efficiency) ग्लोबल प्रोवाइडर्स के मुकाबले कम हो सकती है, जिससे ऑपरेशनल इनएफिशिएंसी (Operational inefficiencies) बढ़ सकती है। रिलायंस जियो (Reliance Jio) जैसी कंपनियां भी क्लाउड स्पेस में उतर रही हैं, लेकिन उन्हें स्थापित दिग्गजों से कड़ी टक्कर मिल रही है।
यह सरकारी कदम डेटा सिक्योरिटी और टेक्नोलॉजी की आजादी के लिए एक लंबी अवधि की रणनीति का संकेत देता है। यह घरेलू इनोवेशन को बढ़ावा दे सकता है, लेकिन इसकी सफलता भारतीय कंपनियों की स्पीड पर निर्भर करेगी कि वे कितनी जल्दी टेक्नोलॉजी के गैप को पाटने और प्रतिस्पर्धी सेवाएं देने में कामयाब होती हैं।
