Union IT Minister Ashwini Vaishnaw ने साफ कर दिया है कि अब भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग (Electronics Manufacturing) के लिए सिर्फ प्रोडक्शन वॉल्यूम (Production Volume) नहीं, बल्कि असली लोकल इनोवेशन (Local Innovation) को तरजीह दी जाएगी। इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) के तहत अब सब्सिडी सीधे तौर पर कंपनियों द्वारा भारत में डिजाइन और इंजीनियरिंग क्षमताएं विकसित करने से जोड़ी गई है।
सरकारी फोकस अब 'स्ट्रेटेजिक वैल्यू' पर
सरकार का फोकस अब मैन्युफैक्चरिंग के स्केल (Scale) से हटकर स्ट्रेटेजिक वैल्यू (Strategic Value) पर है। मंत्री अश्विनी वैष्णव का कहना है कि ECMS पार्टिसिपेंट्स को यह साबित करना होगा कि वे भारत में ही डिजाइन, क्वालिटी कंट्रोल (Quality Control) और इंजीनियरिंग को इंटीग्रेट (Integrate) कर रहे हैं। इस स्कीम के तहत अब तक 29 नए प्रोजेक्ट्स को ₹7,104 करोड़ की मंजूरी मिली है, जिससे कुल अप्रूवल्स ₹61,671 करोड़ के पार निकल गए हैं। पर अब सिर्फ मंजूरी पाना काफी नहीं होगा, भविष्य की फंडिंग इंडस्ट्री द्वारा तय किए गए ऊंचे मानकों को पूरा करने पर निर्भर करेगी। मंत्री ने जोर देकर कहा, 'असली वैल्यू तभी कैप्चर होती है जब डिजाइन भारत में हो।' इस पॉलिसी का लक्ष्य लोकल इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (Intellectual Property) को बढ़ावा देना और ग्लोबल वैल्यू चेन (Value Chain) में ऊपर चढ़ना है।
एग्जीक्यूशन की चुनौतियां और मार्केट पर असर
ECMS को 23 प्रोडक्ट कैटेगरीज में 75 एप्लीकेशंस (Applications) मिली हैं, जिनसे ₹4.5 लाख करोड़ से ज्यादा के प्रोडक्शन और 65,000 से अधिक नौकरियों का अनुमान है। हाल की मंजूरियों में भारत की पहली रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट यूनिट (Rare Earth Permanent Magnet Unit) भी शामिल है, जो लोकल IP पर आधारित है। इसके अलावा हाई-एंड PCBs (PCBs) और कैपेसिटर्स (Capacitors) के प्रोजेक्ट्स भी अप्रूव हुए हैं। लेकिन, सरकार ने कंपनियों के लिए प्रोडक्ट डिजाइन, क्वालिटी स्टैंडर्ड्स, टैलेंट डेवलपमेंट (Talent Development) और लोकल सोर्सिंग (Local Sourcing) की विस्तृत योजनाएं जमा करने के लिए सख्त 15-दिन की समय-सीमा तय की है। यह टाइट शेड्यूल महत्वाकांक्षी डिजाइनों को भरोसेमंद और कॉम्पिटिटिव प्रोडक्ट्स में बदलने में बड़ी चुनौतियां पेश कर सकता है, जिसके लिए जटिल प्रक्रियाएं और मजबूत इंजीनियरिंग की जरूरत होगी। Nifty Electronics इंडेक्स (Index) तो स्थिर बना हुआ है, लेकिन इंडिविजुअल कंपोनेंट मेकर्स (Component Makers) पर अब बढ़ी हुई जांच का सामना करना पड़ेगा। Dixon Technologies (मार्केट कैप ₹55,000 करोड़, P/E 70x) और Amber Enterprises (वैल्यूएशन ₹20,000 करोड़, P/E 55x) जैसी बड़ी कंपनियों के वैल्यूएशन (Valuation) पर असर पड़ सकता है, अगर वे इन नई डिजाइन और क्वालिटी की आवश्यकताओं को पूरा करने में पिछड़ गईं।
महत्वाकांक्षाएं और क्षमताएं
भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, जिसके 2026 तक $300 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि, लोकल डिजाइन की यह दौड़ काफी बड़ी बाधाएं पेश कर सकती है। पिछले सरकारी प्रोग्राम्स, जैसे मॉडिफाइड स्पेशल इंसेंटिव पैकेज स्कीम (M-SIPS), ने बड़ा निवेश आकर्षित किया था, लेकिन वे गहरी लोकल डिजाइन क्षमताओं का निर्माण करने में संघर्ष करते रहे, जिससे अक्सर इंपोर्टेड पार्ट्स (Imported Parts) पर निर्भरता बनी रही। वियतनाम (Vietnam) जैसे प्रतियोगी कम ऑपरेटिंग कॉस्ट (Operating Cost) और मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) की पेशकश करते हैं, जबकि चीन (China) एडवांस्ड R&D (R&D) और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग में आगे है। इस बात का जोखिम है कि सख्त नियम ग्रोथ को धीमा कर सकते हैं, अगर लोकल डिजाइन और इनोवेशन क्षमताएं तेजी से विकसित नहीं हुईं। इससे फंडिग (Funding) रुक सकती है या प्रोजेक्ट्स अपने लक्ष्यों से चूक सकते हैं। एनालिस्ट्स (Analysts) का मानना है कि पॉलिसी की दिशा तो सकारात्मक है, लेकिन सफल एग्जीक्यूशन (Execution) और इंडस्ट्री का अनुकूलन (Adaptation) महत्वपूर्ण है। अत्यधिक महत्वाकांक्षी पॉलिसियां मुश्किलें पैदा कर सकती हैं।
भविष्य के इंसेंटिव्स और निगरानी
सरकार भविष्य के इंसेंटिव्स (Incentives) को सीधे तौर पर डिजाइन, लोकल प्रोडक्शन (Local Production) और क्वालिटी में मापे जाने वाले अचीवमेंट्स (Achievements) से जोड़कर प्रोजेक्ट की प्रगति की सख्त निगरानी करने की योजना बना रही है। जो कंपनियां इस दृष्टिकोण के अनुकूल नहीं होंगी, वे भविष्य के समर्थन (Support) को खोने का जोखिम उठाएंगी। यह दर्शाता है कि केवल वही फर्म्ज (Firms) लाभान्वित होंगी जो रिसर्च (Research), डेवलपमेंट (Development) और लोकल इंजीनियरिंग (Local Engineering) के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता दिखाएंगी। इससे कंसॉलिडेशन (Consolidation) और मर्जर (Mergers) को बढ़ावा मिल सकता है, क्योंकि कंपनियां इन आवश्यक स्किल्स (Skills) को हासिल करने या बनाने का लक्ष्य रखेंगी। आखिरकार, भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग (Electronics Manufacturing) में सफलता कुशल डिजाइनरों (Designers) और इंजीनियरों (Engineers) को तैयार करने पर निर्भर करेगी जो ग्लोबल कंपटीशन (Global Competition) के लिए तैयार हों।