रेवेन्यू में आई भारी गिरावट
ITI Limited के अनऑडिटेड Q3 FY26 नतीजे बताते हैं कि कंपनी के ऑपरेशनल परफॉरमेंस में बड़ी गिरावट आई है। कंपनी का रेवेन्यू पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले 50.27% गिरकर ₹514.65 करोड़ पर पहुंच गया। पिछली तिमाही से तुलना करें तो यह 5.29% की गिरावट है। पहले नौ महीनों (9M FY26) में, रेवेन्यू ₹1556.07 करोड़ रहा, जो पिछले साल की तुलना में 39.48% कम है। कंपनी को नुकसान होना जारी है; Q3 FY26 में प्रॉफिट/लॉस बिफोर टैक्स (Profit/Loss Before Tax) ₹(25.33) करोड़ रहा। हालांकि, नुकसान की राशि पिछले साल के मुकाबले 48.19% कम हुई है, लेकिन यह अब भी एक बड़ा घाटा है। प्रति शेयर आय (EPS) भी ₹(0.26) रही, जो पिछले साल के घाटे से 49.02% बेहतर है।
ऑडिटर्स का 'डिस्क्लेमर' और 'गोइंग कंसर्न' पर सवाल
ITI Limited की फाइलिंग का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा उसके स्टैचुटरी ऑडिटर्स द्वारा कंसोलिडेटेड (Consolidated) और स्टैंडअलोन (Standalone) फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स पर 'डिस्क्लेमर ऑफ कंक्लूजन' जारी करना है। ऑडिटर्स ने कहा कि उन्हें पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं जिससे वे यह निष्कर्ष निकाल सकें कि क्या ये स्टेटमेंट्स Ind-AS और SEBI के नियमों के अनुसार हैं या इनमें कोई बड़ी गलती है। सीधे शब्दों में कहें तो, ऑडिटर्स कंपनी के फाइनेंशियल नतीजों की सटीकता और निष्पक्षता पर कोई राय नहीं दे पा रहे हैं।
इससे भी बड़ी बात यह है कि ऑडिटर्स ने 'गोइंग कंसर्न' के संबंध में 'मटेरियल अनसर्टेनिटी' (Material Uncertainty) बताई है। हालांकि मैनेजमेंट का कहना है कि सरकारी मदद, ₹18,546.44 करोड़ की ऑर्डर बुक और ₹3,025.35 करोड़ की वित्तीय सहायता (Financial Assistance) के चलते 'गोइंग कंसर्न' बेसिस सही है, लेकिन ऑडिटर्स का डिस्क्लेमर कंपनी की लंबी अवधि की व्यवहार्यता (Viability) पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ऑडिटर्स की विस्तृत आपत्तियां:
ऑडिटर्स की राय न बना पाने की वजहें कई गंभीर आपत्तियां हैं:
- रेवेन्यू रिकग्निशन (Revenue Recognition): प्री-कंडीशन्स का पालन न करना, कंट्रोल ट्रांसफर न होना, और कॉस्ट ओवररन, लिक्विडेटेड डैमेजेज व वारंटी खर्चों से होने वाले संभावित नुकसान का आकलन करने में विफलता। इसका असर अभी तय नहीं है।
- अनबिल्ड रेवेन्यू (Unbilled Revenue): स्पष्ट विवरणों की कमी, जिससे लागत पर संभावित असर का पता नहीं।
- ओवरड्यू रिसीवेबल्स (Overdue Receivables): ₹27,167.33 करोड़ का बकाया तीन साल से ज़्यादा पुराना है, जबकि केवल ₹573.07 करोड़ का प्रोविजन किया गया है। शेष ₹26,594.26 करोड़ की कैरिंग वैल्यू सत्यापित नहीं है।
- इन्वेंटरी वैल्यूएशन और ऑब्सेलेसेंस (Inventory Valuation & Obsolescence): बड़ी मात्रा में पुराना स्टॉक पड़ा है; एजिंग और उपयोगिता का आकलन जारी है। वैल्यूएशन लागत या नेट रिलाइजेबल वैल्यू (NRV) में से जो कम हो, उस पर नहीं हुआ हो सकता है, और अपर्याप्त प्रोविजनिंग है। उदाहरण के लिए, म नकापुर (Mankapur) यूनिट में ₹5,210.27 करोड़ का पुराना सामान है जिसका कोई एजिंग असेसमेंट या NRV नहीं दिया गया।
- MSME कंप्लायंस: अपर्याप्त और अविश्वसनीय प्रक्रियाएं।
- सबसीक्वेंट इवेंट्स (Subsequent Events): बुक अपडेट्स जारी रहने के कारण समीक्षा बाधित हुई।
- यूनिट-विशिष्ट मुद्दे: पालक्कड़, रायबरेली, नैनी, म नकापुर और श्रीनगर यूनिट्स में गंभीर समस्याएं पाई गई हैं, जिनमें म नकापुर में PF योगदान (₹2,652.34 करोड़ देनदारी) और ग्रेच्युटी/PL भुगतान (₹3,526.72 करोड़ देनदारी) में डिफॉल्ट शामिल है।
- गवर्नेंस (Governance): बोर्ड में आवश्यक संख्या में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स (Independent Directors) की कमी है, जिनकी नियुक्ति लंबित है।
जोखिम और भविष्य का अनुमान
ऑडिटर्स का 'डिस्क्लेमर' निवेशकों के लिए एक बड़ा रेड फ्लैग है, जो कंपनी की विश्वसनीयता और भविष्य में फंड जुटाने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। ऑडिट आपत्तियों से यह स्पष्ट है कि फाइनेंशियल रिपोर्टिंग और आंतरिक नियंत्रणों में सिस्टमैटिक समस्याएं हैं। भले ही मैनेजमेंट सरकारी समर्थन और ऑर्डर बुक का हवाला दे रहा हो, लेकिन ऑडिटर्स द्वारा बुनियादी फाइनेंशियल डेटा को सत्यापित करने में असमर्थता कंपनी के भविष्य को अत्यधिक अनिश्चित और सट्टा (Speculative) बना देती है।