Flipkart IPO: अब 'फूड' डिलीवरी में उतरेगा Flipkart, Bengaluru में पायलट लॉन्च

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Flipkart IPO: अब 'फूड' डिलीवरी में उतरेगा Flipkart, Bengaluru में पायलट लॉन्च
Overview

Walmart के मालिकाना हक वाली Flipkart, अपने IPO की तैयारी के बीच, Bengaluru में मई-जून तक ऑनलाइन फूड डिलीवरी का एक पायलट (pilot) लॉन्च करने की योजना बना रही है। यह कदम कंपनी के लिए एक बड़ी स्ट्रैटेजिक डाइवर्सिफिकेशन (strategic diversification) साबित हो सकता है, जिसका मकसद अपने लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का इस्तेमाल कर इस सेक्टर में पैठ बनाना है।

Flipkart की बड़ी चाल: फूड डिलीवरी में एंट्री की तैयारी

Flipkart, जो अगले साल 2026 में IPO लाने की फिराक में है, अब भारतीय ऑनलाइन फूड डिलीवरी मार्केट में पैर जमाने की कोशिश कर रही है। कंपनी मई-जून के बीच Bengaluru में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर सकती है। यह कदम Flipkart के लिए एक बड़ा स्ट्रैटेजिक मूव (strategic move) है, जिससे वे अपनी पहुंच बढ़ाना और निवेशकों के सामने मजबूत ग्रोथ स्टोरी पेश करना चाहते हैं। एक ऐसी सर्विस को लाकर जो लोग रोज इस्तेमाल करते हैं, Flipkart का लक्ष्य रोजमर्रा के ग्राहकों के साथ अपनी कनेक्टिविटी बढ़ाना है। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब भारतीय ऑनलाइन फूड डिलीवरी मार्केट के FY25 में करीब $9 बिलियन से बढ़कर FY30 तक $25 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।

लॉजिस्टिक्स का दम और ONDC का दांव

Flipkart के पास पहले से ही एक मजबूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क है, जिसमें 800 से ज़्यादा डार्क स्टोर्स (dark stores) शामिल हैं, जो इसके क्विक कॉमर्स (quick commerce) आर्म, Flipkart Minutes, के लिए इस्तेमाल होते हैं। कंपनी अपनी लास्ट-माइल डिलीवरी (last-mile delivery) क्षमता, माइक्रो-वेयरहाउसिंग (micro-warehousing) और डिमांड फोरकास्टिंग (demand forecasting) जैसी चीजों का फायदा उठाने की सोच रही है। Flipkart इस स्पेस में दो तरीकों से उतरने पर विचार कर रही है: या तो एक अलग ऐप (standalone app) बनाकर, या फिर सरकारी प्लेटफॉर्म ONDC (Open Network for Digital Commerce) के जरिए। ONDC के जरिए एंट्री करने पर कमीशन फीस कम लग सकती है और बिजनेस व कस्टमर दोनों के लिए ज़्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिल सकती है। यह Zomato से अलग है, जो अपने क्विक कॉमर्स आर्म Blinkit पर काफी निवेश कर रहा है और 2025 तक 2,000 डार्क स्टोर्स का लक्ष्य रखता है।

Zomato-Swiggy का दबदबा और पिछली नाकामियां

Flipkart के लिए इस सेक्टर में टिकना आसान नहीं होगा, क्योंकि यहां Zomato और Swiggy का दबदबा है। अनुमान है कि Zomato का मार्केट शेयर 55-58% और Swiggy का 42-45% है। इस मार्केट में कई बड़े खिलाड़ी पहले भी नाकाम हो चुके हैं, जैसे Uber Eats, Ola का फूड वेंचर और Amazon के शुरुआती प्रयास। इन सभी कंपनियों को भारी कैपिटल (capital) और बेहतरीन एग्जीक्यूशन (execution) की ज़रूरत थी, जो वे ला नहीं पाए। Zomato, जिसका शेयर भाव 12 फरवरी 2026 को करीब ₹300.70 था और मार्केट कैप ₹2.93 लाख करोड़ था, ने FY25-26 में ₹21,320 करोड़ का रेवेन्यू और ₹527 करोड़ का नेट प्रॉफिट दर्ज किया। वहीं, Swiggy ने रेवेन्यू बढ़ाने के बावजूद लगातार बड़े नेट लॉस (net loss) दर्ज किए हैं। Zomato का P/E रेश्यो 1,200x से भी ऊपर जाने की खबरें हैं, जो मौजूदा कमाई के मुकाबले काफी ज्यादा वैल्यूएशन दिखाता है।

चुनौतियां और रिस्क

Flipkart की लॉजिस्टिक्स क्षमताएं अच्छी होने के बावजूद, फूड डिलीवरी मार्केट में मुनाफा कमाना एक मुश्किल काम है। इसके लिए काफी ज्यादा कैपिटल की ज़रूरत होगी, ज़बरदस्त प्राइस वॉर (price war) और डीप डिस्काउंटिंग (deep discounting) का सामना करना पड़ेगा। पिछली नाकामियों से पता चलता है कि सिर्फ पुराने मॉडल को कॉपी करना काफी नहीं होगा। Flipkart को कुछ अलग करना होगा। ONDC इंटीग्रेशन से लागत कम हो सकती है, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या यह बड़े पैमाने पर काम करेगा और मौजूदा प्लेयर्स को टक्कर दे पाएगा। Zomato और Swiggy जैसी कंपनियां भी अब प्रॉफिटेबिलिटी (profitability) पर ध्यान दे रही हैं, जिसका मतलब है कि वे नए कंपटीटर के लिए ज़्यादा आसानी से रास्ता नहीं देंगी। इसके अलावा, Flipkart के अपने IPO की तैयारी में भी काफी कैपिटल और ध्यान लगेगा, जो इस नए और रिस्की वेंचर से हट सकता है।

आगे का रास्ता

Flipkart का फूड डिलीवरी में उतरना एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा है, जहां प्लेटफॉर्म्स मल्टी-सर्विस इकोसिस्टम (multi-service ecosystem) बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे ग्राहकों के ज़्यादा से ज़्यादा खर्च पर कब्जा कर सकें। यह कदम, Flipkart के IPO और रेगुलेटरी (regulatory) तैयारियों के साथ मेल खाता है, जो रेवेन्यू बढ़ाने और प्लेटफॉर्म को ज़्यादा चिपचिपा (sticky) बनाने की एक सोची-समझी कोशिश लगती है। इससे कॉम्पिटिशन (competition) बढ़ेगा, जिससे शायद ग्राहकों को शॉर्ट-टर्म में फायदे मिलें, लेकिन कंपनियों के मार्जिन (margin) पर दबाव आ सकता है। Flipkart जैसे बड़े प्लेयर के आने से इंडस्ट्री में कंसॉलिडेशन (consolidation) भी तेज हो सकता है। Flipkart की कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि वे ग्राहकों के लिए क्या खास वैल्यू (value) ला पाते हैं और इस बेहद कॉम्पिटिटिव मार्केट में कितनी अच्छी तरह से एग्जीक्यूट (execute) कर पाते हैं।

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