भारत का एक्सपोर्ट बूस्ट और Apple का कमाल
भारत के स्मार्टफोन एक्सपोर्ट में जबरदस्त उछाल आया है, जो 2025 में $30.13 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इस कामयाबी के पीछे सबसे बड़ा नाम है टेक्नोलॉजी दिग्गज Apple Inc.। कंपनी ने अकेले $23 बिलियन के आईफोन (iPhone) भारत से एक्सपोर्ट किए, जिनमें से ज़्यादातर अमेरिका भेजे गए। 2024 में कुल $20.44 बिलियन के एक्सपोर्ट की तुलना में यह एक बड़ी छलांग है, जिसमें Apple का योगदान दोगुना से भी ज़्यादा रहा। इस ग्रोथ को अमेरिका के प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेटिव (PLI) स्कीम और चीन से इंपोर्ट पर लगने वाले टैरिफ (Tariff) के कारण मिली अस्थायी बढ़त ने और हवा दी। Apple का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) करीब $3.88 ट्रिलियन है और इसका पी/ई रेशियो (P/E Ratio) 33.48 के आसपास है, जो इसकी ग्लोबल अहमियत को दर्शाता है।
बदलता हुआ खेल: टैरिफ का असर
हालांकि, 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा चीन से आने वाले आईफोन पर लगने वाले 20% फेंटानिल टैरिफ (Fentanyl Tariff) को हटाए जाने के फैसले ने खेल का मैदान एक बार फिर बराबर कर दिया है। इस फैसले से भारत को मिली ट्रेड एज (Trade Edge) खत्म हो गई है, जो एक्सपोर्ट में इस बड़ी बढ़ोतरी का एक अहम कारण था।
Apple की इंडिया स्ट्रैटेजी और भारत की बढ़त
Apple अपनी मैन्युफैक्चरिंग को डाइवर्सिफाई (Diversify) करने की बड़ी स्ट्रैटेजी के तहत भारत को एक ज़रूरी प्रोडक्शन हब बना रहा है। कंपनी का लक्ष्य 2027 तक अपने वैश्विक आईफोन प्रोडक्शन का 25% भारत में तैयार करना है। इस स्ट्रैटेजी के चलते, 2025 की दूसरी तिमाही तक भारत, अमेरिका को स्मार्टफोन एक्सपोर्ट करने वाला सबसे बड़ा देश बन गया, जिसने चीन (जिसका हिस्सा 25% था) को पीछे छोड़ते हुए 44% मार्केट शेयर पर कब्ज़ा कर लिया। भारत की PLI स्कीम ने Foxconn और Tata Group जैसी बड़ी कंपनियों को अपना ऑपरेशन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे एक्सपोर्ट की मात्रा में काफी इज़ाफ़ा हुआ।
असली चुनौतियां: कॉस्ट डिसएबिलिटी और प्रतिस्पर्धा
इन शानदार गेन्स के बावजूद, भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में चीन की तुलना में 11% से 14% तक की कॉस्ट डिसएबिलिटी (Cost Disability) का सामना करना पड़ रहा है। जहाँ भारत में लेबर कॉस्ट (Labour Cost) और युवा वर्कफ़ोर्स (Workforce) तो है, वहीं चीन के पास मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम (Ecosystem), स्केल (Scale), एफिशिएंसी (Efficiency) और एडवांस टेक्नोलॉजी (Advanced Technology) में ज़बरदस्त बढ़त है। वियतनाम (Vietnam) भी 30% मार्केट शेयर के साथ एक मज़बूत कंपटीटर बना हुआ है। अब जब अमेरिकी टैरिफ का फायदा खत्म हो गया है, तो भारत को इस फंडामेंटल कैपेबिलिटी गैप (Capability Gap) को भरना होगा।
चीन का दबदबा और PLI स्कीम का अंत
अमेरिकी टैरिफ हटने से भारत के एक्सपोर्ट-ड्रिवन ग्रोथ की कहानी के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। चीन की मैच्योर सप्लाई चेन (Supply Chain), ऑटोमेशन (Automation) और लॉजिस्टिक्स (Logistics) नेटवर्क उसे कॉस्ट और एफिशिएंसी में एक मज़बूत बढ़त देते हैं, जिसकी बराबरी भारत अभी भी करने की कोशिश कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में वैल्यू एडिशन (Value Addition) अभी भी करीब 15% से 20% है, जो कंपोनेंट्स, खासकर सेमीकंडक्टर (Semiconductor) और पीसीबी (PCB) के लिए इंपोर्ट पर निर्भरता दिखाता है। इसके अलावा, भारत की मैन्युफैक्चरिंग बूम का मुख्य ड्राइवर रही प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेटिव (PLI) स्कीम मार्च 2026 तक खत्म होने वाली है, जिससे सरकार की सब्सिडी देने की क्षमता कम हो सकती है और मोमेंटम बनाए रखने के लिए नए इंसेटिव स्ट्रक्चर की ज़रूरत पड़ेगी।
आगे का रास्ता
इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, 2025 के अंत तक भारत का ग्लोबल आईफोन प्रोडक्शन में हिस्सा 25% तक पहुंच सकता है, और 2026 तक यह 35% और 2027 तक 50% तक भी जा सकता है। भारत का बड़ा डोमेस्टिक मार्केट (Domestic Market) भी एक मज़बूत आधार प्रदान करता है। हालांकि, लगातार ग्रोथ के लिए भारत को अपनी लोकल सप्लाई चेन कैपेबिलिटीज (Local Supply Chain Capabilities) को बेहतर बनाना होगा, एडवांस मैन्युफैक्चरिंग में इनवेस्ट करना होगा और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर (Logistics Infrastructure) को मज़बूत करना होगा ताकि चीन जैसी स्थापित ग्लोबल हब्स की तुलना में अपनी कॉस्ट डिसएडेवेंटेज को दूर किया जा सके। सरकार PLI स्कीम के बाद नए इंसेटिव फ्रेमवर्क पर विचार कर रही है ताकि लगातार निवेश और प्रतिस्पर्धा बनी रहे।