भारत का एक्सपोर्ट्स में धमाका!
भारत ने चीन को इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट और सब-असेंबली (Electronics Component and Sub-assembly) का एक्सपोर्ट कर $2.5 बिलियन का नया रिकॉर्ड बनाया है। यह फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) अभी खत्म भी नहीं हुआ है, लेकिन आंकड़े पिछले साल के $920 मिलियन से कहीं आगे निकल गए हैं। अनुमान है कि यह आंकड़ा $3.5 बिलियन तक जा सकता है। इस जबरदस्त ग्रोथ के पीछे Apple इंक. (Apple Inc.) के सप्लाई चेन पार्टनर्स का बड़ा हाथ है, जिन्हें सरकार की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) का भी सपोर्ट मिल रहा है। जनवरी 2026 तक, भारत ने चीन को $2.8 बिलियन का इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट हासिल कर लिया था, जो भारत की कंपोनेंट एक्सपोर्टर के तौर पर बढ़ती भूमिका का संकेत है।
सरकारी स्कीम्स से मिली बूस्ट
एक्सपर्ट्स इस बंपर एक्सपोर्ट का श्रेय स्मार्टफोन के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव (PLI) स्कीम और ECMS के मिले-जुले असर को दे रहे हैं। इन नीतियों ने Apple और उसके पार्टनर्स को ऐसी लोकल मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशंस बनाने के लिए प्रेरित किया है, जो क्वालिटी और स्केल में कॉम्पिटिटिव हों। 2020 में लॉन्च हुई PLI स्कीम के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन FY21 में ₹2.13 लाख करोड़ से बढ़कर FY25 में ₹5.25 लाख करोड़ हो गया है। अप्रैल 2025 में लागू हुई ECMS स्कीम खासतौर पर कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस करती है, जिसमें एक सेल्फ-सस्टेनिंग इकोसिस्टम बनाने के लिए टर्नओवर और कैपिटल एक्सपेंडिचर-लिंक्ड इन्सेंटिव्स दिए जाते हैं। सरकार ने ECMS के लिए बजट को बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ कर दिया है, जिसमें जनवरी 2026 तक 22 नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिली है, जिनमें ₹41,800 करोड़ का इन्वेस्टमेंट शामिल है।
ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव
चीन को भारत के एक्सपोर्ट्स में यह तेजी ग्लोबल सप्लाई चेन को डायवर्सिफाई करने के बड़े ट्रेंड को दर्शाती है, जिसे अक्सर 'China+1' स्ट्रैटेजी कहा जाता है। जहाँ वियतनाम जैसे देश भी चीन को इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट बढ़ा रहे हैं, वहीं भारत के पार्टनर जैसे Foxconn, Tata Electronics, Pegatron, Motherson, Salcomp, TRIL Bangalore और Yuzhan Technology इस बदलाव में अहम भूमिका निभा रहे हैं। जैसे-जैसे चीन में लेबर कॉस्ट बढ़ रही है, भारत में लेबर-इंटेंसिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग ज्यादा कॉस्ट-कॉम्पिटिटिव बनती जा रही है।
चुनौतियां और भविष्य
हालांकि एक्सपोर्ट के आंकड़े काफी पॉजिटिव दिख रहे हैं, लेकिन कुछ गंभीर जोखिम भी बने हुए हैं। यह एक्सपोर्ट सक्सेस काफी हद तक Apple पर केंद्रित है, जिससे कंपनी की स्ट्रैटेजी या प्रोडक्शन वॉल्यूम में किसी भी बदलाव से खतरा पैदा हो सकता है। भारत का चीन के साथ ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) भी एक बड़ी चिंता है, जो 2025 में $106 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। इसके अलावा, भू-राजनीतिक तनाव और संभावित ट्रेड डिस्प्यूट्स एक्सपोर्ट की स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। लंबे समय में, चीन की अपनी महत्वाकांक्षी इंडस्ट्रियल पॉलिसी और डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग में उसकी तेजी से बढ़ती क्षमताएं भारत के लिए एक कॉम्पिटिटिव खतरा पैदा करती हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर का आउटलुक
PLI और ECMS जैसी स्कीम्स की सफलता से पता चलता है कि भारत ग्लोबल मोबाइल फोन प्रोडक्शन में एक बड़ा हिस्सा हासिल कर सकता है, संभवतः 30-35% तक। इस मोमेंटम को बनाए रखने के लिए इंडस्ट्री स्टेकहोल्डर्स PLI 2.0 की वकालत कर रहे हैं। चीन का इलेक्ट्रॉनिक्स इंपोर्ट सालाना $600 बिलियन से अधिक है, जो भारतीय कंपोनेंट्स के लिए एक विशाल बाजार प्रस्तुत करता है। भारत का लक्ष्य 2026 तक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को $300 बिलियन तक ले जाना है, और इस सेक्टर में डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।