भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एप्लीकेशन्स का इस्तेमाल ज़ोरों पर है। अनुमान है कि हर दिन 100 मिलियन (10 करोड़) एक्टिव यूजर्स इन प्लेटफॉर्म्स पर करीब 18 मिनट रोज़ाना बिता रहे हैं।
यह बढ़त दिखाती है कि ग्राहक अब AI को सिर्फ यूटिलिटी से ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं और यह उनके खरीददारी के फैसलों को भी प्रभावित करने लगा है। AI प्रोडक्ट रिकमेन्डेशन, प्राइस कम्पेरिज़न और डिलीवरी एस्टिमेट्स में मदद कर सकता है। लेकिन, रियल-टाइम डेटा जैसे लाइव प्राइसिंग और अवेलेबिलिटी के लिए इसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के साथ गहराई से इंटीग्रेट होना होगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ग्राहक AI फंक्शनैलिटी को सीधे ई-कॉमर्स ऐप्स में ही देखना पसंद करते हैं, जो Amazon और Flipkart जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। भारत में AI इकोसिस्टम में भारी निवेश हो रहा है, जिसमें डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर और AI क्लाउड सर्विसेज पर बड़ा पैसा लगाया जा रहा है। यह भविष्य के लिए मजबूत AI क्षमताओं के निर्माण की ओर एक बड़ा कदम है।
लेकिन AI के सॉफ्टवेयर-एडवांस्ड डेवलपमेंट के बावजूद, स्थापित ई-कॉमर्स कंपनियों का फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर उनके लिए एक बड़ा डिफेंसिव शील्ड बना हुआ है। उनके लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, डिलीवरी सिस्टम और सप्लाई चेन मैनेजमेंट को नए AI प्लेटफॉर्म्स के लिए रेप्लिकेट करना बेहद मुश्किल है। यही ऑपरेशनल दबदबा Amazon, Flipkart और Jio जैसे प्लेयर्स को एक मजबूत 'हार्डवेयर' एडवांटेज देता है, खासकर क्विक कॉमर्स सेक्टर में।
भारत का क्विक कॉमर्स मार्केट काफी बड़ा और तेजी से बढ़ रहा है। FY 2024 में इसकी वैल्यू USD 3.05 बिलियन थी, जो FY 2025 तक $7.1 बिलियन और 2030 तक $35 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। Amazon ने तो 2030 तक भारत में $35 बिलियन से ज़्यादा का अतिरिक्त निवेश करने का वादा किया है, जिससे उसके फिजिकल और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूती मिलेगी। Flipkart का भारत के ई-कॉमर्स मार्केट में करीब 35% शेयर है, जबकि Amazon India 32% के साथ दूसरे नंबर पर है।
Swiggy और Eternal जैसी कंपनियों के लिए असली स्ट्रैटेजिक चुनौती AI का आना नहीं, बल्कि बढ़ते कॉम्पीटिशन और तेजी से डाइवर्सिफाई करने की ऑपरेशनल मुश्किलों से निपटना है। क्विक कॉमर्स सेक्टर, जिसमें Blinkit, Zepto और Swiggy Instamart जैसे खिलाड़ी शामिल हैं, पहले से ही भारी कॉम्पिटिशन और पतले मार्जिन (slim margins) से जूझ रहा है।
ग्रोसरी के अलावा दूसरे सेक्टर्स में डाइवर्सिफाई करना एक बड़ी चुनौती है। इन सेक्टर्स में प्रोडक्ट टर्नओवर धीमा होता है और अलग लॉजिस्टिकल क्षमताओं की ज़रूरत पड़ती है। इसके अलावा, क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेटरी स्क्रूटनी का भी सामना करना पड़ता है, जिसमें प्रिडेटरी प्राइसिंग, सेलर्स की एक्सक्लूसिविटी, फूड सेफ्टी और गिग इकोनॉमी के लेबर प्रैक्टिस से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। Bernstein के एनालिस्ट्स ने भारत के AI मार्केट में अमेरिकी टेक दिग्गजों के दबदबे को लेकर चिंता जताई है। उनका मानना है कि फंडिंग में अंतर और विदेशी कंपनियों की आक्रामक प्राइसिंग स्ट्रेटेजी के कारण डोमेस्टिक प्लेयर्स के पिछड़ने का खतरा है, जो देश की टेक सोवरेन्टी (tech sovereignty) के लिए भी चिंताजनक है।
AI और ई-कॉमर्स के संगम पर काम करने वाली कंपनियों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे कितनी अच्छी तरह से स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप बना पाती हैं और ग्राहकों की बदलती मांगों के साथ तालमेल बिठा पाती हैं। AI प्लेटफॉर्म्स को स्थापित ई-कॉमर्स प्लेयर्स के साथ मिलकर रियल-टाइम प्रोडक्ट डेटा एक्सेस करना होगा, जो ग्राहकों को गाइड करने के लिए बहुत ज़रूरी है। ग्राहक सिंगल AI असिस्टेंट्स के बजाय, परिचित शॉपिंग इंटरफेस में इंटीग्रेटेड AI एक्सपीरियंस को प्राथमिकता देते हैं। AI सेल्स को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है, लेकिन इसकी इफेक्टिवनेस सीधे तौर पर अंडरलाइंग डिजिटल और फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी है। भारत में AI और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर में हो रहा बड़ा निवेश एक मजबूत इकोसिस्टम के निर्माण का संकेत देता है, जो उन प्लेयर्स को फायदा पहुंचाएगा जिनके पास मजबूत ऑपरेशनल क्षमताएं और भविष्य के लिए सही स्ट्रेटेजी होगी।
