Mid-Cap Stocks: बाजार में घमासान के बीच क्यों बढ़ी घरेलू डिमांड वाले शेयरों की चमक?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Mid-Cap Stocks: बाजार में घमासान के बीच क्यों बढ़ी घरेलू डिमांड वाले शेयरों की चमक?

बाजार में बढ़ते फ्यूल कॉस्ट और बॉन्ड यील्ड के दबाव के बीच निवेशक अब ऐसे मिड-कैप शेयरों की तरफ रुख कर रहे हैं, जो घरेलू डिमांड पर टिके हैं। ये कंपनियां ग्लोबल उठापटक के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित मानी जा रही हैं।

ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और बॉन्ड यील्ड में उछाल ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इस अनिश्चितता के दौर में अब ध्यान उन कंपनियों पर शिफ्ट हो रहा है जो अंतरराष्ट्रीय झटकों से काफी हद तक सुरक्षित हैं। जहां लार्ज-कैप शेयर हमेशा रडार पर रहते हैं, वहीं अब निवेशक उन मिड-कैप कंपनियों को तलाश रहे हैं, जिनका पूरा बिजनेस डोमेस्टिक डिमांड यानी घरेलू मांग पर निर्भर है।

घरेलू कंपनियों में क्यों है दम?

हर सेक्टर मैक्रो-इकोनॉमिक दबाव को एक जैसा नहीं झेलता। उदाहरण के तौर पर, लॉजिस्टिक्स जैसी कंपनियां, जो फ्यूल पर ज्यादा निर्भर हैं, तेल की कीमतें बढ़ने पर सीधे दबाव में आ जाती हैं। वहीं, बॉन्ड यील्ड बढ़ने से फाइनेंशियल कंपनियों की लेंडिंग पर असर पड़ता है। इसके उलट, रोजमर्रा की जरूरत (FMCG), बेवरेजेस और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कंपनियां ज्यादा स्थिर बनी रहती हैं। यह घरेलू फोकस ग्लोबल सेंटिमेंट के खिलाफ एक नेचुरल बफर की तरह काम करता है।

सही चुनाव कैसे करें?

मिड-कैप शेयरों में ग्रोथ का मौका तो बड़ा है, लेकिन रिस्क भी ज्यादा होता है। आर्थिक अस्थिरता के समय कर्ज (Debt) में डूबी कंपनियां सबसे पहले लड़खड़ाती हैं। बढ़ती लागत के बीच अगर कंपनी के पास 'प्राइसिंग पावर' नहीं है, तो उसका मार्जिन गिरना तय है। इसलिए, सिर्फ सेक्टर देखकर निवेश न करें, कंपनी की सेहत परखना जरूरी है।

इन 3 Metrics पर रखें नजर:

  1. डेब्ट रेशियो (Debt Ratio): बढ़ती ब्याज दरों के दौर में ज्यादा कर्ज वाली कंपनियों से दूरी बनाना ही समझदारी है।
  2. अर्निंग क्वालिटी (Earnings Quality): यह देखें कि मुनाफा कंपनी के असली बिजनेस से आ रहा है या किसी वन-टाइम अकाउंटिंग गेन से।
  3. प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin): जो कंपनियां इनपुट कॉस्ट बढ़ने के बाद भी अपना मार्जिन बरकरार रख पा रही हैं, वे लंबी रेस के घोड़े साबित हो सकती हैं।

फिलहाल, निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो को रीकैलिब्रेट करने की जरूरत है। हाई-ग्रोथ के चक्कर में रिस्क लेने के बजाय, उन कंपनियों पर नजर रखें जो ऑपरेशनली मजबूत हैं। मैनेजमेंट की कमेंट्री और तिमाही नतीजों में डेट लेवल में आ रहे बदलाव पर बारीक नजर रखना ही इस उतार-चढ़ाव वाले मार्केट का मंत्र है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.