IPO में रिटेल निवेशकों का इंटरेस्ट कम? लिस्टिंग गेन घटकर सिर्फ 7%

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
IPO में रिटेल निवेशकों का इंटरेस्ट कम? लिस्टिंग गेन घटकर सिर्फ 7%

नए IPOs से होने वाली कमाई घट गई है! पिछले साल जहां IPO लिस्टिंग पर औसतन **29%** का रिटर्न मिल रहा था, वहीं अब यह घटकर **7%** रह गया है। हालिया लिस्टिंग में तो **17%** की गिरावट देखी गई है। ऐसे में, निवेशक अब जल्दी मुनाफा कमाने की बजाय कंपनी के फंडामेंटल्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

IPO मार्केट में आई नरमी

फाइनेंशियल ईयर 2026 में भारतीय प्राइमरी मार्केट ने ₹1.9 लाख करोड़ जुटाकर रिकॉर्ड बनाया है। लेकिन इस बंपर IPO सप्लाई के बीच रिटेल निवेशकों का उत्साह कम होता दिख रहा है। अब यह उम्मीद कम हो गई है कि हर नया IPO लिस्टिंग वाले दिन ही बड़ा मुनाफा देगा। लिस्टिंग गेन औसतन 7% पर आ गया है, जो पिछले साल 29% था।

क्यों बदल रहे हैं निवेशक?

हाल के IPOs लिस्टिंग के बाद 17% तक गिर गए हैं। इस वजह से रिटेल निवेशक, जो पहले IPO को जल्दी पैसा बनाने का जरिया मानते थे, अब सतर्क हो गए हैं। एप्लीकेशन नंबर्स में भी यह बदलाव दिख रहा है। निवेशक अब हाइप की बजाय कंपनी के फंडामेंटल्स और सही वैल्यूएशन पर फोकस कर रहे हैं।

जुलाई 2026 का हाल

जुलाई 2026 में यह साफ हो गया कि भले ही कंपनियां कैपिटल जुटाने के लिए मार्केट में आ रही हैं, लेकिन रिटेल निवेशकों की तरफ से उतनी दिलचस्पी नहीं दिख रही। कुछ बड़े IPOs को अंडरसब्सक्रिप्शन या सिर्फ सिंगल-डिजिट ओवरसब्सक्रिप्शन मिला, जो पहले के मल्टी-टाइम ओवरसब्सक्रिप्शन से बिल्कुल अलग है।

मार्केट एक्सपर्ट्स की राय

मार्केट एनालिस्ट्स का कहना है कि लिस्टिंग गेन में यह गिरावट एक नेचुरल एडजस्टमेंट है। पहले, बहुत ज्यादा लिस्टिंग गेन के कारण IPOs का वैल्यूएशन बढ़ जाता था, जिससे आगे ग्रोथ की गुंजाइश कम बचती थी। जब कंपनियां फ्यूचर अर्निंग्स के अनुमान के आधार पर प्राइसिंग करती हैं, तो रिटेल खरीदारों के लिए सेफ्टी मार्जिन लगभग खत्म हो जाता है। अब निवेशक प्राइसिंग पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और महंगी या सिर्फ एग्जिट के लिए आई कंपनियों से दूर रह रहे हैं।

डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स का बढ़ता रोल

यह ट्रेंड भारतीय मार्केट के बदलते स्वरूप को भी दिखाता है, जहां डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (जैसे म्यूचुअल फंड्स और इंश्योरेंस कंपनियां) का रोल बढ़ रहा है। ये इंस्टीट्यूशन्स अब फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स से ज्यादा NSE-लिस्टेड स्टॉक्स में हिस्सेदारी रखते हैं। ऐसे में, प्रोफेशनल मनी मैनेजर्स लिक्विडिटी बढ़ा रहे हैं। रिटेल निवेशक भी इसी ट्रेंड को फॉलो करते हुए हाइप के पीछे भागने के बजाय क्लियर अर्निंग्स वाली कंपनियों को चुन रहे हैं।

आगे क्या?

निवेशकों के लिए सबसे बड़ा रिस्क लिस्टिंग के बाद के परफॉरमेंस की वोलेटिलिटी है। हालिया IPOs में 17% की नेगेटिव एवरेज रिटर्न इस बात की याद दिलाती है कि IPOs में मुनाफा पक्का नहीं है। रिटेल निवेशकों के लिए अगला कदम 'लिस्टिंग गेन' की सोच से बाहर निकलना होगा। निवेशकों को कंपनी के डेट लेवल, प्रॉफिट मार्जिन और यह देखना चाहिए कि जुटाया गया पैसा बिजनेस एक्सपेंशन के लिए है या सिर्फ पुराने निवेशकों को एग्जिट दिलाने के लिए। आने वाले महीनों में जब और IPOs आएंगे, तो क्वालिटी बिजनेस और स्पेकुलेटिव बेट्स के बीच अंतर करने की क्षमता बहुत जरूरी होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.