Quest Investment Managers के CIO राकेश व्यास ने भारतीय बाजार के लिए चेताया है। $100 के करीब पहुंचते Brent Crude और FII की लगातार बिकवाली से बाजार में दबाव है, हालांकि पावर और कंज्यूमर जैसे सेक्टर लंबी अवधि में चमक सकते हैं।
बाजार पर मंडराते बादल
भारतीय शेयर बाजार इस वक्त एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। Quest Investment Managers के CIO राकेश व्यास का मानना है कि बाजार में उतार-चढ़ाव की मुख्य वजह ग्लोबल और घरेलू स्तर पर दिख रहे दबाव हैं। निवेशकों का सेंटिमेंट फिलहाल नाजुक है, और अल्पकालिक (short-term) बाधाएं मजबूती से हावी हैं।
क्यों बढ़ी है चिंता?
सबसे बड़ा खतरा Brent Crude के $100 प्रति बैरल के करीब पहुंचने से है। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है, इसलिए कच्चे तेल के ऊंचे दाम कॉर्पोरेट मुनाफे, रुपए की वैल्यू और महंगाई पर सीधा असर डाल रहे हैं। साथ ही, FII की लगातार बिकवाली ने भी बाजार के मूड को खराब किया है, जिससे निवेशक इस समय थोड़ा बचाव (defensive) का रुख अपना रहे हैं।
लंबी अवधि की रणनीति और फोकस एरिया
इन तमाम मुश्किलों के बावजूद, राकेश व्यास कुछ स्ट्रक्चरल थीम्स को लेकर बुलिश हैं। उनकी निवेश रणनीति उन सेक्टरों पर केंद्रित है जो बाजार के शोर से दूर अपनी विकास यात्रा जारी रख सकते हैं:
- पावर सेक्टर: ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन में ग्रोथ की बड़ी संभावना है।
- मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट: वे कंपनियां जो चुनौतियों के बीच भी अपनी ऑपरेशनल स्ट्रेंथ बनाए रख सकती हैं।
- कंज्यूमर सेगमेंट: बाजार अब अनऑर्गनाइज्ड से ऑर्गनाइज्ड सेक्टर की ओर शिफ्ट हो रहा है। व्यास का मानना है कि यहां 'वैल्यू-फोकस्ड' कंपनियों में ही पैसा लगाना समझदारी है।
बैंकिंग सेक्टर पर नजरिया
वित्तीय क्षेत्र (Financial Sector) के लिए उनका रुख काफी सिलेक्टिव है। वे सभी बैंकों पर एक साथ दांव लगाने के बजाय उन चुनिंदा प्राइवेट बैंकों और NBFCs को प्राथमिकता दे रहे हैं जो अच्छी तरह से कैपिटलाइज्ड हैं और बिना एसेट क्वालिटी से समझौता किए बाजार हिस्सेदारी बढ़ा सकते हैं।
निवेशकों के लिए सलाह
आने वाले समय में कंपनियों की 'प्राइसिंग पावर' और 'बैलेंस शीट' की मजबूती सबसे बड़ा टेस्ट होगी। जो कंपनियां इनपुट कॉस्ट के बढ़ने पर उसे ग्राहकों पर शिफ्ट नहीं कर पाएंगी, उनके मार्जिन पर तगड़ा असर पड़ सकता है। फिलहाल निवेशकों को कच्चे तेल की कीमतों, FII के निवेश के रुख और कंपनियों के नतीजों (Quarterly Results) पर कड़ी नजर रखने की जरूरत है।
