Pre-IPO Shares: इन लिस्टिंग से पहले की कंपनियों के शेयरों से सावधान! IPO प्राइस से कहीं ज्यादा था दाम

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Pre-IPO Shares: इन लिस्टिंग से पहले की कंपनियों के शेयरों से सावधान! IPO प्राइस से कहीं ज्यादा था दाम

लिस्टिंग से पहले यानी Pre-IPO मार्केट में कई निवेशक कंपनियों के शेयर IPO आने से पहले ही खरीद लेते हैं, इस उम्मीद में कि उन्हें बड़ा मुनाफा होगा। लेकिन, HDB Financial Services और Tata Capital जैसी कंपनियों के मामले में यह सच साबित नहीं हुआ। इन कंपनियों के शेयर IPO प्राइस से कहीं ज़्यादा कीमत पर बिक रहे थे, लेकिन जब असली IPO आया तो दाम काफी कम निकला।

Pre-IPO मार्केट का सच

भारतीय अनलिस्टेड शेयर (Unlisted Share) मार्केट में आजकल खूब हलचल है। कई रिटेल निवेशक कंपनियों के IPO आने से काफी पहले ही उनके शेयर खरीद लेते हैं। उनका मकसद होता है कि वे जल्दी एंट्री लें और लिस्टिंग के बाद मोटा मुनाफा कमा सकें।

लेकिन, हाल के आंकड़े बताते हैं कि यह स्ट्रेटेजी काफी रिस्की हो सकती है। निवेशक अक्सर प्राइवेट मार्केट में देखे जाने वाले ऊंचे दामों को ही कंपनी का सही वैल्यू मान लेते हैं। उन्हें यह नहीं पता होता कि जब कंपनी और उसके बैंकर असली IPO प्राइस तय करेंगे, तो वह दाम इन प्राइवेट मार्केट के दामों से काफी कम हो सकता है।

क्यों Pre-IPO दाम असल IPO प्राइस से अलग होते हैं?

प्री-IPO और असल IPO मार्केट के काम करने का तरीका अलग है। अनलिस्टेड मार्केट में खरीदार और बेचने वाले कम होते हैं। ऐसे में, कुछ बड़े खरीदार सिर्फ अफवाहों या हाइप के कारण दाम बढ़ा सकते हैं। इससे कंपनी की वैल्यूएशन तो बहुत बढ़ जाती है, लेकिन यह उसके असल फाइनेंशियल परफॉर्मेंस को नहीं दिखाता।

जब कंपनी अपने IPO के लिए डॉक्यूमेंट फाइल करती है, तो प्राइस डिस्कवरी में बड़े इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स, एनालिस्ट और स्टैंडर्ड वैल्यूएशन मॉडल शामिल होते हैं। इसी वजह से IPO का इश्यू प्राइस अक्सर ज्यादा प्रैक्टिकल होता है।

ताज़ा उदाहरण

HDB Financial Services के शेयर प्री-IPO मार्केट में काफी ऊंचे दामों पर ट्रेड कर रहे थे, लेकिन जब कंपनी ने अपने पब्लिक ऑफर का प्राइस रेंज बताया तो वह दाम काफी कम निकला। इसी तरह, Tata Capital के शेयर भी IPO प्राइसिंग से कहीं ज्यादा रेट पर बिक रहे थे। SBI Funds Management के मामले में तो इश्यू प्राइस, प्री-IPO मार्केट में चल रहे रेट से 30% से भी कम रखा गया। ये उदाहरण साफ दिखाते हैं कि प्री-IPO मार्केट के ऊंचे दाम हमेशा कंपनी की असली कीमत नहीं बताते।

भावनाओं में बहकर निवेश का जाल

बहुत से निवेशक FOMO (Fear Of Missing Out) यानी 'कुछ छूट जाने का डर' से प्रेरित होकर कंपनी की कमाई, रिटर्न ऑन इक्विटी और कर्ज जैसे बेसिक फाइनेंशियल इंडिकेटर्स को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। जब कोई बड़ा ब्रांड लिस्ट होने वाला होता है, तो मार्केट में अक्सर एक्सक्लूसिविटी की बात होती है, न कि कंपनी के वैल्यूएशन मल्टीपल्स की, जो लिस्ट हो चुकी कंपनियों के मुकाबले हों।

एक बिजनेस भले ही मजबूत और मुनाफे वाला हो, लेकिन अगर निवेशक उसकी कमाई के मुकाबले बहुत ज्यादा कीमत चुकाता है, तो लंबे समय में पैसा बनाने की संभावना कम हो जाती है।

प्रोफेशनल इन्वेस्टर्स इस बात पर ध्यान देते हैं कि कंपनी की वैल्यूएशन उसके सेक्टर के दूसरे प्लेयर्स के मुकाबले कैसी है और उसकी ग्रोथ की संभावनाएं प्राइस को जस्टिफाई करती हैं या नहीं। प्री-IPO में निवेश करते समय, निवेशकों को बिजनेस मॉडल और कमाई की स्थिरता को समझना चाहिए, न कि सिर्फ प्राइवेट ट्रांजेक्शन प्राइस पर ध्यान देना चाहिए।

ज्यादा कीमत पर शेयर खरीदने से, भले ही वह क्वालिटी वाली कंपनी हो, रिटर्न खराब हो सकता है, क्योंकि पब्लिक मार्केट में शेयर का दाम आखिर में कंपनी के फंडामेंटल से जुड़ ही जाता है। इसलिए, अनलिस्टेड स्पेस में वैल्यूएशन को लेकर सतर्क रहें और मार्केट सेंटिमेंट के बजाय पब्लिक डिस्क्लोजर और फाइलिंग डेटा के आधार पर फैसले लें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.