Nifty 50 के लिए डॉलर आधारित रिटर्न का गणित बिगड़ गया है और यह वापस सितंबर 2021 के स्तर पर आ गया है। रुपये में गिरावट और FPI की बिकवाली ने विदेशी निवेशकों के लिए मुनाफे को पूरी तरह से धो दिया है।
करेंसी का दबाव और निवेशकों का नुकसान
भारतीय बाजार में एक अजीब स्थिति देखने को मिल रही है। जहां रुपये के लिहाज से निफ्टी 17,500 के स्तर से ऊपर चढ़कर 23,200 तक पहुंचा है, वहीं डॉलर में निवेश करने वालों के लिए तस्वीर बिल्कुल अलग है। रुपये के कमजोर होकर ₹96 प्रति डॉलर के करीब पहुंचने से विदेशी निवेशकों का मुनाफा पूरी तरह सिमट गया है। जब घरेलू करेंसी अपनी वैल्यू खोती है, तो विदेशी फंड्स के लिए भारतीय शेयरों का आकर्षण कम हो जाता है, क्योंकि स्टॉक में होने वाली बढ़त करेंसी की गिरावट में ही दब जाती है।
ग्लोबल मार्केट का 'मैक्रो' दबाव
बाजार पर सिर्फ करेंसी का ही नहीं, बल्कि कई अन्य मोर्चों से भी दबाव है। Brent Crude ऑयल की कीमतें $108 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा बोझ है। इससे न केवल महंगाई बढ़ती है, बल्कि कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर भी सीधी चोट पड़ती है।
इसके अलावा, US Treasury Yields का 5% के करीब पहुंचना इमर्जिंग मार्केट्स के लिए खतरे की घंटी है। इस वजह से विदेशी निवेशकों (FPI) ने सितंबर के पहले पखवाड़े में ही भारतीय बाजारों से ₹14,000 करोड़ से ज्यादा की पूंजी निकाल ली है। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने बाजार को संभालने की पूरी कोशिश की है, लेकिन विदेशी बिकवाली एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
आगे क्या रहेगा अहम?
निवेशकों को अब पूरी तरह से ग्लोबल संकेतकों पर नजर रखनी होगी। रुपये की चाल, कच्चे तेल के दाम और US Federal Reserve के ब्याज दरों पर कमेंट्स ही तय करेंगे कि बाजार की अगली चाल क्या होगी। अगर रुपये में और कमजोरी आती है, तो डॉलर-एडजस्टेड निफ्टी रिटर्न का दबाव बना रहेगा।
