सितंबर 2026 की शुरुआत में भारतीय बाजार में बढ़ी हुई वोलैटिलिटी (Volatility) के बीच निवेशक अब डिविडेंड देने वाली कंपनियों की तरफ रुख कर रहे हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि केवल हाई डिविडेंड यील्ड देखकर निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए पेआउट रेश्यो (Payout Ratio) की जांच बेहद जरूरी है।
सितंबर 2026 की शुरुआत में Nifty 50 और BSE Sensex में जारी करेक्शन के बीच बाजार के सेंटीमेंट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। निवेशक अब ऐसी कंपनियों को प्राथमिकता दे रहे हैं जो नियमित कैश डिविडेंड देती हैं, ताकि गिरते बाजार में पोर्टफोलियो को कुछ हद तक सहारा मिल सके।\n\nइस साल अब तक Nifty 500 इंडेक्स में 45 डिविडेंड अनाउंसमेंट दर्ज की गई हैं। हालांकि, बाजार के जानकारों का साफ कहना है कि हाई डिविडेंड यील्ड का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि कंपनी सुरक्षित है। कई बार कंपनियां अपनी गिरती ग्रोथ या बढ़ते कर्ज को छिपाने के लिए भी बड़ा डिविडेंड बांटती हैं।\n\n### पेआउट रेश्यो का गणित\nनिवेशकों को यह समझना होगा कि एक सस्टेनेबल डिविडेंड वही है जहां कंपनी अपने कुल मुनाफे का 60% से 70% हिस्सा ही शेयरधारकों को देती है। यदि कोई कंपनी इससे ज्यादा पैसा बांट रही है, तो उसके पास भविष्य के विस्तार (Expansion) या अचानक आई फाइनेंशियल मुश्किलों से निपटने के लिए कैश कम पड़ सकता है।\n\n### ध्यान रखने वाली बातें:\n* टैक्स का असर: डिविडेंड आपकी इनकम स्लैब के हिसाब से टैक्स के दायरे में आता है, जिससे आपकी कुल रिटर्न कम हो सकती है।\n* मार्केट रिस्क: यह भ्रम न पालें कि डिविडेंड देने वाले शेयर गिरेंगे नहीं। अगर पूरे सेक्टर में बिकवाली है, तो ये शेयर भी नीचे गिर सकते हैं।\n* चेकलिस्ट: निवेश से पहले कंपनी का कैश फ्लो, कर्ज का स्तर और पिछले वर्षों में डिविडेंड देने का रिकॉर्ड जरूर देखें।\n\nअंत में, केवल यील्ड देखकर फैसला न लें। एनुअल रिपोर्ट देखें और यह परखें कि क्या कंपनी अपने बिजनेस में निवेश के साथ-साथ डिविडेंड बांटने का सही बैलेंस बना पा रही है या नहीं।
