NSE ने फरवरी 2026 तक 25 करोड़ यूनिक क्लाइंट कोड्स (UCCs) का आंकड़ा पार कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यह ग्रोथ इतनी तेज है कि पिछले सिर्फ 2 महीनों में ही 1 करोड़ नए अकाउंट जोड़े गए। गौर करने वाली बात यह है कि बीते 16 महीनों में कुल 5 करोड़ नए अकाउंट खुले, जो कि एक्सचेंज के कुल खातों का एक चौथाई हिस्सा है। यह आंकड़ा दिखाता है कि जनवरी 2026 तक रजिस्टर्ड 12.7 करोड़ निवेशकों की संख्या 2020 की शुरुआत के मुकाबले चार गुना से भी ज्यादा हो गई है, जब यह करीब 4 करोड़ डीमैट अकाउंट्स हुआ करती थी।
इस शानदार उछाल के पीछे मुख्य वजहें तेजी से बढ़ता डिजिटाइजेशन, फिनटेक कंपनियों का दबदबा और सस्ते व आसानी से उपलब्ध ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स हैं। भौगोलिक तौर पर देखें तो महाराष्ट्र 4.2 करोड़ अकाउंट्स के साथ सबसे आगे है, जिसके बाद उत्तर प्रदेश और गुजरात का नंबर आता है। सिर्फ शेयरों में ही नहीं, बल्कि सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान्स (SIPs) में भी जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है। अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच करीब 6 करोड़ नए SIP अकाउंट खोले गए, जिनमें हर महीने औसतन ₹28,766 करोड़ का निवेश हुआ। इसी का नतीजा है कि NSE पर लिस्टेड कंपनियों की मार्केट कैप में रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़कर 18.6% हो गई है, जबकि 5 साल पहले यह सिर्फ 14.6% थी। पिछले 5 सालों में Nifty 50 और Nifty 500 ने क्रमशः 11.3% और 13.7% का सालाना रिटर्न देकर निवेशकों का भरोसा और बढ़ाया है।
हालांकि, इस रिकॉर्ड तोड़ ग्रोथ के साथ कुछ चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं। इतने बड़े पैमाने पर नए निवेशकों के बाजार में आने से इसमें अस्थिरता (volatility) बढ़ने का खतरा बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि कई नए निवेशक, खासकर युवा वर्ग, सीमित वित्तीय साक्षरता (financial literacy) के चलते 'FOMO' (Fear Of Missing Out) या किसी ट्रेंड के बहकावे में आकर निवेश कर रहे हैं। SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) इस स्थिति को भांपते हुए डेरिवेटिव्स जैसे जटिल और जोखिम भरे सेगमेंट में रिटेल निवेशकों के लिए नियम और सख्त करने पर विचार कर रहा है, ताकि उन्हें बड़े नुकसान से बचाया जा सके। सस्ते प्लेटफॉर्म्स ने जहां बाजार को आम आदमी के लिए सुलभ बनाया है, वहीं इसने सट्टेबाजी (speculative trading) को भी बढ़ावा दिया है, जिससे शेयर की कीमतें उनके असल मूल्य से दूर जा सकती हैं।
भविष्य की ओर देखें तो, NSE के अधिकारियों का कहना है कि अकाउंट्स की यह तेज ग्रोथ निवेशकों का बढ़ता भरोसा और इक्विटी को एक महत्वपूर्ण बचत साधन के तौर पर स्वीकार करना दिखाती है। अब जोर निवेशक जागरूकता बढ़ाने, अनुशासित निवेश को बढ़ावा देने और बाजार की सुरक्षा को मजबूत करने पर है, ताकि यह momentum टिकाऊ संपत्ति निर्माण में बदल सके। भारत की इक्विटी मार्केट में फिलहाल सिर्फ 8% लोगों की ही हिस्सेदारी है, जो विकसित देशों की तुलना में काफी कम है, यानी अभी भी ग्रोथ की काफी गुंजाइश है। लेकिन, इस ग्रोथ की असल कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि निवेशक कितने सूचित और समझदार बनते हैं और नियामक उपाय कितने प्रभावी रहते हैं।