Motilal Oswal Private Wealth ने अपने मॉडल पोर्टफोलियो में बड़ा बदलाव किया है। फर्म ने मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों में निवेश बढ़ाकर **50%** कर दिया है, जबकि लार्ज-कैप का हिस्सा घटाकर **40%** कर दिया गया है। फर्म का मानना है कि अब मुनाफा सिर्फ बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि डिफेंस और स्पेशलाइज्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टरों में भी बढ़त दिख रही है।
पोर्टफोलियो में क्यों हुआ बदलाव?
Motilal Oswal Private Wealth ने अपने 2026 के मॉडल पोर्टफोलियो में यह अहम फेरबदल किया है। फर्म ने मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों के लिए अपने अलॉटमेंट को 40% से बढ़ाकर 50% कर दिया है। वहीं, लार्ज-कैप और हाइब्रिड स्ट्रैटेजी के लिए यह हिस्सा 50% से घटाकर 40% कर दिया गया है। ग्लोबल इक्विटी में 10% का अलॉटमेंट पहले जैसा ही रखा गया है।
वैल्यूएशन और कमाई का अनुमान
इस री-बैलेंसिंग की मुख्य वजह इक्विटी मार्केट में आई हालिया गिरावट के बाद मिड-साइज और छोटी कंपनियों के वैल्यूएशन का आकर्षक होना है। फर्म के विश्लेषण के अनुसार, कमाई में बढ़ोतरी का चक्र अब सिर्फ देश की सबसे बड़ी कंपनियों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह बेंचमार्क इंडेक्स के बाहर की कंपनियों तक भी फैलेगा। इस बदलाव से फर्म का लक्ष्य उन क्षेत्रों में ग्रोथ का फायदा उठाना है जहाँ लंबी अवधि में ज्यादा विस्तार की संभावना दिख रही है।
फोकस सेक्टर और स्टॉक
Motilal Oswal ने उन खास सेक्टर्स की पहचान की है जहाँ अगले चरण की ग्रोथ देखने को मिल सकती है। इनमें डिफेंस, कैपिटल गुड्स, हेल्थकेयर सर्विसेज, डायग्नोस्टिक्स, स्पेशलाइज्ड मैन्युफैक्चरिंग और वेल्थ मैनेजमेंट जैसे क्षेत्र शामिल हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन सेक्टर्स में लीडरशिप पिछले साइकल्स की तुलना में तेजी से बदल रही है, इसलिए स्टॉक का चुनाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उदाहरण के लिए, फर्म का मानना है कि पारंपरिक फार्मा कंपनियों की तुलना में हेल्थकेयर सर्विस प्रोवाइडर्स और डायग्नोस्टिक चेन्स में अभी ज्यादा ग्रोथ दिख रही है। इसी तरह, फाइनेंसियल सेक्टर में, पारंपरिक बैंकों की तुलना में वेल्थ मैनेजमेंट और स्टॉक एक्सचेंज से जुड़ी फर्में खास अवसर पेश कर रही हैं।
जोखिम प्रबंधन और मार्केट पर राय
छोटी कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाने के बावजूद, फर्म का भारतीय इक्विटी पर ओवरऑल रुख अभी भी न्यूट्रल (Neutral) है। निवेशकों को एकमुश्त पैसा लगाने से बचने की सलाह दी गई है, और इसके बजाय धीरे-धीरे निवेश (Staggered Investment Approach) करने को बेहतर बताया गया है। भारत के मीडियम-टर्म आउटलुक में महंगाई का कम होना, ब्याज दरों में कटौती की संभावना और प्राइवेट खर्चों का बढ़ना जैसे फैक्टर शामिल हैं। हालांकि, फर्म ने यह भी चेतावनी दी है कि भू-राजनीतिक तनाव और अप्रत्याशित ट्रेड डेवलपमेंट जैसी चीजें नियर-टर्म स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं। निवेशकों को इन छोटे सेगमेंट्स में कमाई की असल रफ्तार और बड़ी कंपनियों की तुलना में ये कंपनियां मार्केट की वोलेटिलिटी (Volatility) को कैसे संभालती हैं, इस पर नजर रखनी होगी।
