3 अगस्त 2026 से शुरू हुए भारत के नए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (Closing Auction Session) के कारण प्रोपराइटरी ट्रेडिंग (Proprietary Trading) यानी अपनी पूंजी से ट्रेडिंग करने वाली फर्मों के वॉल्यूम में करीब **50%** की भारी गिरावट आई है। पुराने प्राइस कैलकुलेशन तरीके से हटकर **20 मिनट** की नई ऑक्शन विंडो ने ट्रेडर्स के लिए अनिश्चितता पैदा कर दी है। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस बदलाव से बाजार के आखिरी मिनटों में स्टॉक्स और इंडेक्स में अधिक प्राइस वोलैटिलिटी (Price Volatility) बढ़ सकती है।
क्लोजिंग ऑक्शन में बड़े बदलाव का असर
भारतीय शेयर बाजार में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव आया है। 3 अगस्त 2026 से F&O-एलिजिबल स्टॉक्स के लिए नया क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) लागू कर दिया गया है। इस बदलाव ने स्टॉक्स और इंडेक्स के फाइनल क्लोजिंग प्राइस (Closing Price) को तय करने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है। इसका असर प्रोपराइटरी ट्रेडिंग फर्मों पर साफ दिख रहा है, जो अपने क्लाइंट के पैसे की बजाय अपनी खुद की पूंजी का इस्तेमाल करके ट्रेडिंग करती हैं।
क्या है नया नियम?
पुराने सिस्टम में, क्लोजिंग प्राइस की गणना सेशन के आखिरी 30 मिनट की ट्रेडिंग एक्टिविटी के आधार पर की जाती थी, जिसे वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस (Volume-Weighted Average Price) मेथड कहते थे। अब नए सिस्टम में इसकी जगह 20 मिनट की एक अलग ऑक्शन विंडो (3:15 PM से 3:35 PM) होगी। यह बदलाव भारतीय बाजारों को ग्लोबल प्रैक्टिसेस के अनुरूप बनाने और फाइनल प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) को बेहतर बनाने की दिशा में एक कदम है।
प्रोप ट्रेडिंग में 50% की गिरावट
लेकिन यह बदलाव आसान नहीं रहा। मार्केट डेटा बता रहा है कि नए नियम लागू होने के एक हफ्ते के अंदर ही प्रोपराइटरी ट्रेडिंग एक्टिविटी में लगभग 50% की कमी आई है। ट्रेडर्स का कहना है कि नई ऑक्शन विंडो काफी अनिश्चितता पैदा कर रही है। चूंकि फाइनल प्राइस अब लगातार ट्रेडिंग के बजाय एक अलग ऑक्शन से तय हो रहा है, इसलिए फर्मों के लिए अपनी पोजीशन को हेज (Hedge) करना मुश्किल हो गया है, खासकर उन ऑप्शंस के लिए जो उसी दिन एक्सपायर होते हैं। रिस्क मैनेज करने में यह दिक्कत कई फर्मों को मार्केट से पीछे हटने पर मजबूर कर रही है।
ऑप्शन प्रीमियम और लिक्विडिटी पर भी असर
इस बदलाव ने ऑप्शन प्रीमियम (Option Premiums) को भी प्रभावित किया है। ऑप्शन सेलर्स, जो अपने ट्रेड्स को मैनेज करने के लिए प्राइस मूवमेंट की भविष्यवाणी पर निर्भर करते हैं, अब एक नए तरह के रिस्क का सामना कर रहे हैं। ऑक्शन विंडो के दौरान अचानक बड़े प्राइस मूव की संभावना से एक्सपेक्टेड वोलैटिलिटी (Expected Volatility) बढ़ गई है, जिससे इन ट्रेडर्स को अपने रिस्क के लिए ज्यादा प्रीमियम मांगना पड़ रहा है। यह लिक्विडिटी प्रोवाइडर्स के लिए एक मुश्किल माहौल बना रहा है, क्योंकि उन्हें चिंता है कि अगर क्लोजिंग प्राइस ऑक्शन के दौरान काफी बदलता है तो वे अनचाही पोजीशन के साथ फंस सकते हैं।
SEBI का रुख और रिटेल निवेशकों के लिए सलाह
ट्रेडिंग डेस्क से इस विरोध के बावजूद, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) अपने रुख पर कायम है। रेगुलेटर ने संकेत दिया है कि वे इस सिस्टम को वापस लेने का इरादा नहीं रखते हैं। SEBI के अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान वोलैटिलिटी और मार्केट में आई रुकावटें सामान्य शुरुआती समस्याएं हैं जो एक बड़े नए मार्केट मैकेनिज्म के लागू होने पर होती हैं।
रिटेल निवेशकों के लिए सबसे बड़ी बात यह है कि ट्रेडिंग डे के आखिरी कुछ मिनटों में अब पहले से ज्यादा अप्रत्याशित प्राइस स्विंग्स (Price Swings) देखने को मिल सकते हैं। हालांकि यह एक स्ट्रक्चरल बदलाव है और लंबे समय में मार्केट के लिए जरूरी नहीं कि यह नकारात्मक हो, लेकिन इसका मतलब यह है कि लिक्विडिटी (Liquidity) – यानी बड़े प्राइस चेंज के बिना आसानी से खरीदने या बेचने की क्षमता – अस्थायी रूप से कम हो सकती है। निवेशकों को अगले कुछ हफ्तों में देखना चाहिए कि मार्केट इन नए ऑक्शन नियमों के साथ कैसे तालमेल बिठाता है, क्योंकि ट्रेडर्स धीरे-धीरे नए क्लोजिंग मैकेनिज्म को संभालने के लिए अपनी रणनीतियों को संशोधित कर रहे हैं।
