स्मॉल और मिड कैप्स का दबदबा, लेकिन सेक्टर्स में दिखी कमजोरी
फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच, भारतीय इक्विटी मार्केट्स में परफॉरमेंस का एक बड़ा अंतर देखने को मिला। Nifty Smallcap 100 इंडेक्स 6.5% चढ़ा, जबकि Nifty Midcap 100 इंडेक्स 2.2% बढ़ा। वहीं, Nifty 50 और BSE Sensex जैसे ब्रॉडर इंडेक्स 4% और 4.8% तक गिर गए। यह दिखाता है कि बाजार की चाल सिर्फ इकोनॉमी रिकवरी पर नहीं, बल्कि निवेशकों की खास पसंद पर निर्भर कर रही है।
Nifty Metal इंडेक्स 6.6% के साथ सबसे आगे रहा। रिएलिटी, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और फार्मा सेक्टर्स में 1% से 2% तक की मामूली बढ़त दिखी। दूसरी ओर, Nifty PSU Bank इंडेक्स में 11% की भारी गिरावट आई। ऑटो और प्राइवेट बैंक इंडेक्स 7% गिरे, जबकि ऑयल एंड गैस और आईटी सेक्टर्स में भी 5.6% और 4.6% की गिरावट देखी गई, जो इन सेक्टर्स में कमजोरी का संकेत है।
आकर्षक वैल्यूएशन और निवेशकों का पैसा
स्मॉल और मिड-कैप स्टॉक्स के अच्छा प्रदर्शन करने के पीछे कई वजहें हैं। 2025 में अंडरपरफॉर्म करने के बाद और पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद आई गिरावट से इनके वैल्यूएशन्स आकर्षक हो गए थे। इक्विनॉमिक्स रिसर्च (Equinomics Research) के जी चोक्कलिंगम (G Chokkalingam) के मुताबिक, कमजोर प्राइमरी मार्केट ने रिटेल कैपिटल को सेकेंडरी इक्विटीज, खासकर छोटी कंपनियों में धकेला।
इस ट्रेंड को डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) का सपोर्ट मिला, जिन्होंने फरवरी 27 से अप्रैल 27, 2026 के बीच करीब ₹1.9 ट्रिलियन का निवेश किया। इससे फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) के ₹1.7 ट्रिलियन के आउटफ्लो को बैलेंस करने में मदद मिली, जैसा कि NSDL के आंकड़ों से पता चलता है। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि स्मॉल और मिड-कैप स्टॉक्स अगले दो सालों में सालाना 20-25% का रिटर्न दे सकते हैं, जो लार्ज कैप्स के अनुमानित 16% रिटर्न से कहीं ज्यादा है।
फिलहाल, स्मॉल-कैप स्टॉक्स अपने एक साल के फॉरवर्ड पी/ई (P/E) पर 19.8x पर ट्रेड कर रहे हैं, जो उनके पांच साल के औसत 19.9x के करीब है। वहीं, इनका पी/बी (P/B) रेश्यो 2.4x है, जो पांच साल के औसत 2.8x से नीचे है। यह दर्शाता है कि अर्निंग्स रिकवरी साइकिल और सुधरते बैलेंस शीट्स को देखते हुए रिस्क-रिवॉर्ड फिलहाल ठीक-ठाक लग रहा है।
बड़े जोखिम जो कर सकते हैं चिंता
स्मॉल और मिड-कैप्स को लेकर उम्मीदों के बावजूद, कुछ बड़े जोखिमों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। यह रैली मुख्य रूप से डोमेस्टिक इनफ्लो पर टिकी है, और विदेशी निवेशक ग्लोबल वैल्यूएशन और करेंसी स्टेबिलिटी पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, इसलिए उनके जल्द वापसी की उम्मीद कम है।
पश्चिम एशिया की अस्थिरता से तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी एक बड़ा खतरा है। इससे इन्फ्लेशन फिर से बढ़ सकता है, कंज्यूमर डिमांड पर बुरा असर पड़ सकता है और कॉर्पोरेट मार्जिन सिकुड़ सकते हैं, खासकर ऑटो और आईटी जैसे सेक्टर्स में। भारतीय रुपये (INR) का गिरना एक और चिंता का विषय है, जिससे इंपोर्ट कॉस्ट बढ़ेगी और डॉलर-डिनॉमिनेटेड देनदारियों वाली कंपनियों के लिए डेट सर्विसिंग महंगी हो जाएगी।
सेक्टर्स में दिख रहा यह बड़ा अंतर भी चिंताजनक है। पीएसयू बैंक में 11% की भारी गिरावट पारंपरिक सेक्टर्स में स्ट्रेस का संकेत देती है, जो व्यापक बाजार में फैल सकता है। हालांकि स्मॉल-कैप वैल्यूएशन्स ऐतिहासिक रूप से उचित लग रहे हैं, लेकिन वे अपने लॉन्ग-टर्म एवरेज से प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं। Nifty Smallcap 100 RSI भी यह संकेत देता है कि यह सेगमेंट ओवरबॉट (Overbought) हो सकता है, जिससे शार्प करेक्शन का खतरा बना हुआ है।
