भारतीय निवेशक अब सिर्फ भारत में नहीं, ग्लोबल थीम में लगा रहे पैसा! क्या है वजह?

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारतीय निवेशक अब सिर्फ भारत में नहीं, ग्लोबल थीम में लगा रहे पैसा! क्या है वजह?
Overview

भारतीय निवेशकों का निवेश का तरीका बदल रहा है। अब वे सिर्फ भारत तक सीमित न रहकर, दुनिया भर की ग्लोबल थीम्स में पैसा लगा रहे हैं। Moneycontrol Global Wealth Summit 2026 में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि यह 'थीमैटिक ग्लोबल डाइवर्सिफिकेशन' रिटर्न को स्टेबल रखने और दुनिया भर में इनोवेशन से जुड़ी ग्रोथ का फायदा उठाने में मदद करेगा।

क्यों बदल रहा है भारतीय निवेशकों का नज़रिया?

भारतीय निवेशक पारंपरिक तौर पर अपने पोर्टफोलियो को देश के विकास पर केंद्रित रखते आए हैं। लेकिन हाल के बाज़ार में आई गिरावट और वैश्विक उथल-पुथल ने सिर्फ एक ही बाज़ार पर निर्भर रहने की सीमाओं को उजागर कर दिया है। Moneycontrol Global Wealth Summit 2026 में इस बात पर खास ज़ोर दिया गया कि डाइवर्सिफिकेशन (विविधीकरण) अब सिर्फ रिस्क कम करने का तरीका नहीं, बल्कि एक मुख्य रणनीति बन गई है। विशेषज्ञों ने समझाया कि निवेश को दुनिया भर में फैलाना, खासकर थीम के आधार पर, जोखिम को समझदारी से मैनेज करने में मदद करता है। यह पोर्टफोलियो के प्रदर्शन को किसी एक देश के इकोनॉमिक साइकल से कम जोड़ता है। Marcellus Investment Managers के फाउंडर और CIO, सौरभ मुखर्जी (Saurabh Mukherjea) ने कहा कि यह तरीका रिटर्न्स को स्टेबल (स्थिर) करने और किसी एक अर्थव्यवस्था के भारी उतार-चढ़ाव से बचने में मददगार है।

ग्लोबल इनोवेशन का फायदा कैसे उठाएं?

भारत से बाहर निवेश करने का एक बड़ा कारण इनोवेशन-संचालित ग्रोथ (innovation-driven growth) की तलाश है। PGIM India Mutual Fund के CEO, अभिषेक तिवारी (Abhishek Tiwari) ने बताया कि जहाँ भारत स्थिर ग्रोथ दे रहा है, वहीं AI और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में बड़ी और अभूतपूर्व इनोवेशन (breakthrough innovations) दुनिया भर में हो रही हैं। इस बदलाव के लिए, सिर्फ देश चुनने के बजाय AI, सेमीकंडक्टर, एनर्जी ट्रांज़िशन (ऊर्जा परिवर्तन) और एडवांस्ड हेल्थकेयर (उन्नत स्वास्थ्य सेवा) जैसे क्षेत्रों में वैश्विक अवसरों पर केंद्रित थीम-आधारित निवेश (theme-led investing) की ज़रूरत है। निवेशकों को बेहतर रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न्स के लिए यह सवाल पूछना होगा कि किन सेक्टर्स में निवेश किया जाए। उदाहरण के लिए, PGIM India Global Equity Opportunities Fund of Fund को लॉन्ग-टर्म कैपिटल ग्रोथ के लिए अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों में एक्सपोज़र देने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

ग्लोबल बाज़ारों का भारतीय इक्विटी से बेहतर प्रदर्शन

साल 2025 से 2026 तक के बाज़ार के प्रदर्शन में एक बड़ा अंतर देखा गया। जहाँ भारतीय शेयरों ने अपनी जगह बनाए रखी, वहीं अमेरिकी बाज़ारों में ज़बरदस्त उछाल आया, जिसने ग्लोबल डाइवर्सिफिकेशन के महत्व को साबित किया। MSCI India इंडेक्स ने 2025 में USD में लगभग 4% का रिटर्न दिया, जो MSCI Emerging Markets Index से काफी पीछे रहा, जिसमें 20% से ज़्यादा की उछाल आई थी। इस पिछड़ने का कारण भारतीय बाज़ारों में हाई वैल्यूएशन, धीमी अर्निंग्स ग्रोथ और विदेशी निवेशकों द्वारा बड़ी मात्रा में किया गया आउटफ्लो (पैसे की निकासी) था। इसके बजाय, ग्लोबल पैसा टेक्नोलॉजी और AI बाज़ारों में लगा। Marcellus Investment Managers जैसी कंपनियाँ इन हालातों से जूझ रही हैं। भले ही उनकी 'Consistent Compounders' स्कीम ने एक साल में 8.37% का रिटर्न दिया हो, लेकिन वैल्यूएशन की गलतियों के कारण उनके एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) में गिरावट आई है। PGIM India के Global Equity Opportunities FoF, जिसे 2013 में लॉन्च किया गया था, के पास फरवरी 2026 तक ₹1,511 करोड़ का AUM था, और शुरुआत से अब तक कुल 9.41% का रिटर्न दिया है।

वैश्विक आर्थिक कारक और करेंसी रिस्क

वैश्विक आर्थिक रुझान (global economic trends) भारतीय निवेशों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। अमेरिका जैसे देशों में हाई इन्फ्लेशन (उच्च महंगाई) और बढ़ती इंटरेस्ट रेट्स (ब्याज दरें) उभरते बाज़ारों से पूंजी खींच सकती हैं, जिससे भारतीय रुपए (INR) जैसी करेंसीज़ कमजोर हो सकती हैं। सितंबर 2024 के बाद से INR 8% से ज़्यादा गिर चुका है और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90 को पार कर गया है, जिससे विदेशी निवेशकों के मुनाफे को नुकसान हुआ है। इस करेंसी कमजोरी से भारतीय निवेशकों के विदेशी संपत्तियों (overseas assets) में रखे गए निवेशों का जोखिम बढ़ जाता है। करेंसी हेजिंग (currency hedging) की बढ़ती लागत भी भारतीय बॉन्ड्स को डॉलर बॉन्ड्स की तुलना में कम आकर्षक बनाती है। हालाँकि, अमेरिका के फेडरल रिजर्व द्वारा 2025 के अंत तक संभावित रेट कट्स (ब्याज दरों में कटौती) से ग्लोबल लिक्विडिटी (तरलता) बढ़ सकती है, उभरते बाज़ारों में रुचि बढ़ सकती है, और INR में स्थिरता आ सकती है, जिससे विदेशी निवेशकों के आउटफ्लो (पैसे की निकासी) धीमा हो सकता है।

वैश्विक निवेश नियमों का सामना

दुनिया भर में निवेश करने का मतलब है जटिल नियमों से निपटना। विदेश में निवेश करने वाली भारतीय कंपनियों को FEMA और RBI के दिशानिर्देशों का पालन करना होता है, जिसमें निवेश की राशि की सीमाएं और कुछ खास सेक्टर्स के लिए संभावित मंज़ूरी शामिल है। जहाँ स्थापित निवेश गंतव्य (established investment destinations) मौजूद हैं, वहीं नए भी उभर रहे हैं। EY की एक रिपोर्ट में वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत के आउटबाउंड निवेश (foreign investments) में 67.74% की तेज़ी देखी गई, जो $41.6 बिलियन तक पहुँच गया, जो एक स्पष्ट रणनीतिक कदम दर्शाता है। व्यक्तिगत निवेशकों के लिए, प्लेटफ़ॉर्म लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के माध्यम से सीधे निवेश करना आसान बना रहे हैं। फिर भी, करेंसी के उतार-चढ़ाव और अलग-अलग टैक्स नियमों पर विचार करना प्रमुख कारक हैं।

जोखिम अभी भी मौजूद: वैल्यूएशन और भू-राजनीति

ग्लोबल डाइवर्सिफिकेशन और थीमैटिक इन्वेस्टिंग पर ध्यान केंद्रित करने के बावजूद, महत्वपूर्ण जोखिम बने हुए हैं। भारतीय और वैश्विक दोनों बाज़ारों में, खासकर AI सेक्टर्स में, हाई वैल्यूएशन (उच्च मूल्यांकन) एक बाज़ार सुधार (market correction) का कारण बन सकते हैं। भारत का स्टॉक मार्केट अक्सर अन्य उभरते बाज़ारों की तुलना में प्रीमियम पर ट्रेड करता है, और विकास की संभावनाओं से उचित होने पर भी, इसमें गलतियों की गुंजाइश बहुत कम बचती है। भू-राजनीतिक संघर्ष (geopolitical conflicts), जैसे मध्य पूर्व में, ऊर्जा आपूर्ति को बाधित कर चुके हैं, जिससे वोलेटिलिटी (अस्थिरता) और इन्फ्लेशन (महंगाई) की चिंताएँ बढ़ गई हैं। व्यवहारिक पक्षपात (Behavioral biases) भी निवेशकों को प्रभावित करते हैं। Dezerv के वैभव पोवाल (Vaibhav Porwal) ने बताया कि कई निवेशक कंपनी के फंडामेंटल्स के बजाय प्राइस में बदलाव पर प्रतिक्रिया करते हैं, जो अनुशासित निवेश (disciplined investing) की आवश्यकता को रेखांकित करता है। भारत में विदेशी निवेशकों के लिए, डॉलर के मुकाबले कमजोर INR एक बड़ी चिंता है। RBI इसके मूवमेंट को नियंत्रित करने में कम सक्रिय भूमिका निभाता दिख रहा है। हालाँकि RBI अटकलों को रोकने और रुपए को स्थिर करने के लिए कुछ करेंसी पोजीशन को सीमित करता है, बैंकों द्वारा बड़ी ओपन पोजीशन बाज़ार में उतार-चढ़ाव ला सकती है।

विशेषज्ञों का आगे का नज़रिया

आम राय यह है कि बेहतर रिस्क मैनेजमेंट और नए इनोवेशंस तक पहुँच की ज़रूरत के कारण ग्लोबल डाइवर्सिफिकेशन जारी रहेगा। भारत की अर्थव्यवस्था से मज़बूत ग्रोथ जारी रहने की उम्मीद है, लेकिन उच्च वैल्यूएशन और विदेशी निवेशकों की भावनाओं के कारण इसका स्टॉक मार्केट वैश्विक साथियों के साथ तालमेल बिठाने में चुनौतियों का सामना कर सकता है। समिट में विशेषज्ञों ने अनुशासित निवेश और लंबी अवधि के दृष्टिकोण के महत्व पर सहमति जताई। बाज़ार में अस्थिरता बने रहने की संभावना को देखते हुए, ध्यान अल्पकालिक मूल्य परिवर्तनों का पीछा करने से हटकर व्यवसायों को समझने और थीमैटिक निवेश के विचारों पर केंद्रित हो रहा है।

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