बाजार की गिरावट में फंड्स का बढ़ता निवेश
भारतीय म्यूचुअल फंड मैनेजर्स ने मार्च 2026 में इक्विटी में एक बड़ी रकम का निवेश करके अपना मजबूत भरोसा दिखाया। यह खरीदारी तब हुई जब भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई की चिंताओं के चलते बेंचमार्क इंडेक्स मार्च 2020 के बाद अपनी सबसे बड़ी मासिक गिरावट का सामना कर रहे थे। ICICI Securities के अनुमान के मुताबिक, यह निवेश करीब ₹80,000 करोड़ का था, जिससे एक्टिव इक्विटी म्यूचुअल फंड्स की कैश होल्डिंग्स फरवरी के ₹1.7 लाख करोड़ से घटकर लगभग ₹1.3 लाख करोड़ रह गई। एक्टिव इक्विटी फंड्स के लिए कैश-टू-एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) रेशियो लगभग 3% पर आ गया।
रिकॉर्ड FII बिकवाली के बावजूद DIIs का सहारा
मार्च 2026 में बाजार में एक बड़ी गिरावट दर्ज की गई। Nifty 50 इंडेक्स 11.36% लुढ़का और Sensex 11.5% नीचे आया। ब्रॉडर इंडेक्स जैसे BSE MidCap 150 में भी गिरावट आई, वहीं BSE SmallCap 250 में 1.89% से 2.25% तक की भारी बिकवाली देखने को मिली। इस गिरावट की एक बड़ी वजह Foreign Portfolio Investors (FPIs) द्वारा की गई रिकॉर्ड ₹1.17 लाख करोड़ की बिकवाली रही, जो किसी भी महीने का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इसके विपरीत, Domestic Institutional Investors (DIIs) ने ₹1.28 लाख करोड़ (₹142,960.37 करोड़) का शुद्ध निवेश करके बाजार को सहारा दिया और विदेशी बिकवाली के दबाव को काफी हद तक संभाला। Nifty 50 मार्च के अंत में 22,331.4 अंकों पर बंद हुआ, जबकि Sensex 71,947.5 पर रहा। Nifty 50 का औसत P/E अनुपात मार्च 2026 में लगभग 21.1 था, जो इसके 10-साल के औसत 23.43 से कम है, यानी वैल्यूएशन बहुत ज्यादा नहीं थे।
कच्चे तेल का बढ़ता दाम और रुपये का दबाव
बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान और अमेरिका के बीच, ने बाजार की अस्थिरता को बढ़ाया और FPI की बिकवाली को तेज किया। इस अनिश्चितता के बीच ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी उछाल आया, Brent क्रूड $100-$115 प्रति बैरल के पार निकल गया। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह एक बड़ा आर्थिक जोखिम है। विश्लेषकों का अनुमान है कि क्रूड ऑयल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी भारत की हेडलाइन इन्फ्लेशन में 0.55-0.60% अंक और FY27 में करंट अकाउंट डेफिसिट को 0.30-0.40% अंक तक बढ़ा सकती है। मार्च 2026 में महंगाई के 3.4% तक पहुंचने की उम्मीद थी। इसी दौरान, भारतीय रुपया भी कमजोर हुआ और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹94-₹95 के करीब आ गया, जिससे विदेशी निवेशकों के मुनाफे में कमी आई और आयात लागत बढ़ गई। इन्हीं कारणों से FPIs ने मार्च में इक्विटी में ₹1.17 लाख करोड़ की बिकवाली की, खासकर BFSI, IT, Auto और FMCG जैसे सेक्टर्स में। यह मार्च 2025 के ट्रेंड के विपरीत था, जब म्यूचुअल फंड्स ने हाई वैल्यूएशन और सावधानी के चलते करीब ₹1.96 लाख करोड़ की रिकॉर्ड कैश होल्डिंग्स बनाए रखी थी।
निवेशकों के लिए जोखिम बरकरार
घरेलू म्यूचुअल फंड्स की खरीदारी के बावजूद, बाजार में कई अहम जोखिम बने हुए हैं। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संघर्ष सबसे बड़ा खतरा है, जो अस्थिरता पैदा कर रहा है और विदेशी निवेश को हतोत्साहित कर रहा है। लगातार ऊंची क्रूड ऑयल कीमतों के चलते रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को महंगाई से लड़ने के लिए ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं, जिससे आर्थिक ग्रोथ धीमी हो सकती है। कमजोर रुपया आयात लागत को बढ़ाकर और कॉर्पोरेट प्रॉफिट को कम करके इन समस्याओं को और बढ़ाएगा। मिड- और स्मॉल-कैप स्टॉक्स में भले ही कुछ समय के लिए तेजी दिखी हो, लेकिन मार्च के अंत में इनमें भी बिकवाली देखी गई, जो इन ज्यादा वोलेटाइल सेगमेंट्स में लगातार सावधानी का संकेत देता है। BFSI और IT जैसे सेक्टर्स में FPIs की आक्रामक बिकवाली दिखाती है कि ग्लोबल निवेशक निकट अवधि में बाजार की संभावनाओं को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
आगे क्या? घरेलू मजबूती पर निर्भर
बाजार की भविष्य की दिशा भू-राजनीतिक तनाव में कमी और मजबूत घरेलू निवेश पर निर्भर करेगी। Axis Securities ने Nifty 50 के लिए मार्च 2026 तक 25,500 का बेस केस टारगेट और ऑप्टिमिस्टिक सिनेरियो में 26,800 तक जाने का अनुमान लगाया है। Nifty 50 का P/E अनुपात 21.1 अपने लॉन्ग-टर्म एवरेज से नीचे है, जो ग्रोथ की क्षमता दिखाता है, बशर्ते आर्थिक स्थिरता बनी रहे और कंपनियों की कमाई (corporate earnings) बढ़ती रहे। DIIs के समर्थन से भारतीय म्यूचुअल फंड्स की लगातार खरीदारी, ग्लोबल अनिश्चितताओं के बावजूद, भारत की लॉन्ग-टर्म आर्थिक कहानी में एक मजबूत विश्वास का संकेत देती है।