भारतीय शेयर बाज़ार: गोल्ड, FD, रियल एस्टेट से भी बेहतर? जानें क्यों 'सबसे कम महंगे' हैं शेयर!

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारतीय शेयर बाज़ार: गोल्ड, FD, रियल एस्टेट से भी बेहतर? जानें क्यों 'सबसे कम महंगे' हैं शेयर!
Overview

भारत में भले ही बाज़ार में करेक्शन (Correction) आया हो, लेकिन जानकारों के मुताबिक, भारतीय इक्विटीज़ (Indian Equities) अभी भी फिक्स्ड डिपॉजिट्स (Fixed Deposits), गोल्ड (Gold), सिल्वर (Silver) और रियल एस्टेट (Real Estate) जैसे दूसरे घरेलू एसेट क्लास की तुलना में सबसे कम ओवरवैल्यूड (Overvalued) यानी 'महंगी' साबित हो रही हैं। Nifty 50 का P/E रेश्यो लगभग **21.3** है।

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भारतीय शेयर बाज़ार की शान

बाजार में भले ही शेयरों की कीमतों में कुछ गिरावट आई हो, लेकिन जानकारों का मानना है कि भारत में मौजूद अन्य एसेट क्लास की तुलना में अभी भी इक्विटी (शेयर) ही सबसे कम महंगी साबित हो रही है। Nifty 50 इंडेक्स का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो करीब 21.3 है, जो इसके ऐतिहासिक औसत P/E रेश्यो 20.55 से थोड़ा ज़्यादा है। लेकिन, जब इसकी तुलना इंटरनेशनल मार्केट से करते हैं, तो यह ज़्यादा आकर्षक लगता है। इमर्जिंग मार्केट इक्विटीज़ का P/E 16.11 और अमेरिकी S&P 500 इंडेक्स का P/E 26.49 है। इससे साफ है कि भारतीय शेयर, भले ही सस्ते न हों, पर अन्य घरेलू निवेश के मुकाबले कम ओवरवैल्यूड हैं।

फिक्स्ड डिपॉजिट्स: नॉमिनल रिटर्न का जाल

भारत में फिक्स्ड डिपॉजिट्स पर फिलहाल 6% से 7% तक का ब्याज मिल रहा है। वहीं, फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए महंगाई दर (Inflation) 4.5% रहने का अनुमान है। इसका मतलब है कि इन डिपॉजिट्स पर मिलने वाला असली रिटर्न (Real Return) सिर्फ 1% से 2% तक ही सीमित है। महंगाई के घटने-बढ़ने पर यह रिटर्न और भी कम या नेगेटिव (Negative) हो सकता है।

गोल्ड और सिल्वर: अनिश्चितता का दौर

सेफ-हेवन (Safe Haven) माने जाने वाले गोल्ड (Gold) में पिछले एक महीने में करीब 3.55% की गिरावट आई है, हालांकि यह पिछले एक साल में 45% से ज़्यादा बढ़ा है। पर लंबी अवधि में इसका रियल एनुअल रिटर्न (Real Annual Return) मात्र 1.1% रहा है। माइनिंग (Mining) और डिजिटल एसेट्स (Digital Assets) जैसे बिटकॉइन (Bitcoin) से मुकाबला इसकी अनिश्चितता को बढ़ा सकता है। सिल्वर (Silver) भी वोलेटाइल (Volatile) है, जो पिछले महीने 1.78% गिरा लेकिन साल-दर-साल बड़ा है। इसकी इंडस्ट्रियल डिमांड (Industrial Demand) कम होने का अनुमान है।

रियल एस्टेट: धीमी पड़ती चाल

भारतीय रियल एस्टेट (Real Estate) बाज़ार में भी सुस्ती दिख रही है। खरीदारों की डिमांड (Demand) घट रही है और बिना बिका इन्वेंटरी (Inventory) बढ़ रहा है। ऐसे में, प्रॉपर्टी की कीमतों में सालाना ग्रोथ (Growth) सिर्फ 3% से 5% रहने का अनुमान है। ऊंचे दाम और खरीदारों की चयनात्मकता इस ट्रेंड का कारण बन रही है।

भारतीय बाज़ार के बड़े जोखिम

इन सबके बावजूद, भारतीय बाज़ार कई बड़े जोखिमों का सामना कर रहा है। Nifty 50 का P/E रेश्यो 21.3 अभी भी लॉन्ग-टर्म एवरेज से ऊपर है, जो बताता है कि वैल्यूएशन (Valuation) ऊंचे हैं। मध्य-पूर्व में जियोपॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Tensions), खासकर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में रुकावट, भारत की एनर्जी सिक्योरिटी (Energy Security) और करेंसी (Currency) को खतरे में डाल सकती है। क्रूड ऑयल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतें करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) को बढ़ा सकती हैं, जिससे रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (Reserve Bank of India) को हाई इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) लंबे समय तक बनाए रखने पड़ सकते हैं। 2026 में उम्मीद से कम मॉनसून (Monsoon) भी एक बड़ा जोखिम है, जो फ़ूड इन्फ्लेशन (Food Inflation) को बढ़ा सकता है।

भविष्य की राह और डाइवर्सिफिकेशन

कुल मिलाकर, भारतीय इक्विटीज़ घरेलू एसेट क्लास की तुलना में बेहतर दिख रही हैं, पर बाज़ार ग्लोबल इकोनॉमिक शिफ्ट्स (Global Economic Shifts) और लोकल चुनौतियों के प्रति संवेदनशील है। इंटरनेशनल डाइवर्सिफिकेशन (International Diversification) पोर्टफोलियो को बैलेंस करने के लिए एक समझदारी भरा कदम हो सकता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.