क्यों पिछड़ रहा था भारतीय बाजार?
पिछले 18 महीनों में भारतीय शेयर बाजार (Stock Market) ने ग्लोबल बेंचमार्क, जैसे S&P 500, के मुकाबले लगभग 24% का प्रदर्शन कम किया है। इसकी मुख्य वजहें थीं - महंगे वैल्यूएशन (Valuation), शहरी कंजम्पशन (Consumption) में सुस्ती, कंपनियों की कमजोर अर्निंग्स (Earnings), और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की बिकवाली।
लेकिन अब सरकार की नीतियों, जैसे GST में बदलाव, टैक्स रिफॉर्म्स और मॉनेटरी ईजिंग (Monetary Easing) से बाजार में जान आ रही है। कंजम्पशन बढ़ रहा है, क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) मजबूत हो रही है और इंफ्रा (Infra) इन्वेस्टमेंट में तेजी दिख रही है, जो सीमेंट वॉल्यूम के बढ़ते आंकड़ों से जाहिर है। अमेरिका के साथ बेहतर होते ट्रेड रिलेशंस (Trade Relations) और भू-राजनीतिक मोर्चों पर भारत की सक्रियता से भी माहौल सकारात्मक हुआ है। मार्केट में आए करेक्शन (Correction) ने वैल्यूएशन को भी आकर्षक बना दिया है, जिससे कई एक्सपर्ट्स के अनुसार, निराशा के दौर के बाद अब खरीदारी का अच्छा मौका बन रहा है।
सेक्टरों में दिख रही मजबूती, पर खतरे भी कम नहीं
कई फंडामेंटली मजबूत कंपनियां, जो बिकवाली का शिकार हुई थीं, अब वापसी के लिए तैयार दिख रही हैं। डिफेंस सेक्टर में सरकारी फोकस और नए ऑर्डर्स (Orders) से तेजी है। उदाहरण के लिए, Bharat Dynamics के पास ₹25,500 करोड़ का ऑर्डर बुक और ₹50,000 करोड़ की पाइपलाइन (Pipeline) है। एनालिस्ट्स (Analysts) का इस पर न्यूट्रल (Neutral) नजरिया है, टारगेट प्राइस ₹1010 से ₹1539 तक का है, जिसका P/E वैल्यूएशन 40-42x के आसपास है।
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में Dixon Technologies को मजबूत डिमांड का फायदा मिल रहा है, लेकिन मेमोरी चिप्स की बढ़ती लागत और ग्लोबल सप्लाई की दिक्कतें नियर-टर्म (Near-term) में सिरदर्द बन सकती हैं। इसका P/E रेशियो 34-42x के बीच है, जो बुक वैल्यू (Book Value) का लगभग 15 गुना है। कंपनी के लिए 'आउटपरफॉर्म' (Outperform) की राय है, टारगेट प्राइस ₹10,446 से ₹15,082 तक का है।
ITC को एक स्टेबल वैल्यू प्ले (Value Play) माना जा रहा है, जो लगभग 4.5-4.6% का डिविडेंड यील्ड (Dividend Yield) और डेट-फ्री (Debt-free) बैलेंस शीट (Balance Sheet) देती है। सिगरेट बिजनेस की मजबूती और FMCG पोर्टफोलियो का विस्तार इसके साथ है, हालांकि पिछले 5 सालों में सेल्स ग्रोथ (Sales Growth) थोड़ी धीमी रही है।
IndiGo जैसे एविएशन (Aviation) सेक्टर की कंपनी का डोमेस्टिक मार्केट में 62% का दबदबा है। लेकिन इसका P/E रेशियो 54-60x पर काफी ऊंचा है और यह क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतों के उतार-चढ़ाव से सीधे प्रभावित होती है। सीमेंट सेक्टर में हाउसिंग और इंफ्रा से मजबूत ग्रोथ के संकेत हैं, साथ ही GST रिफॉर्म्स से डिमांड बढ़ने की उम्मीद है। फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए क्रेडिट ग्रोथ 11.5-12.5% के दायरे में रहने का अनुमान है।
भू-राजनीतिक जोखिमों का असर
हालांकि, बाजार की मौजूदा तेजी पर कई बड़े जोखिम मंडरा रहे हैं। मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान-इजराइल के बीच का संघर्ष, एक बड़ी चिंता है। भारत कच्चे तेल (Crude Oil) का 55% आयात करता है और इस क्षेत्र में 17% एक्सपोर्ट (Export) भी करता है, ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने और इन्फ्लेशन (Inflation) की मार झेलनी पड़ सकती है। लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष सप्लाई चेन (Supply Chain) को बाधित कर सकते हैं और आर्थिक स्थिरता को खतरे में डाल सकते हैं।
IndiGo जैसी एयरलाइन्स के लिए एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की बढ़ती कीमतें सीधे मुनाफे को कम कर सकती हैं। इसी तरह, केमिकल और पेंट बनाने वाली कंपनियों को भी कच्चे तेल से जुड़े इनपुट कॉस्ट (Input Cost) बढ़ने से मार्जिन प्रेशर (Margin Pressure) का सामना करना पड़ेगा। Dixon Technologies भी सप्लाई चेन की दिक्कतों और कंपोनेंट कॉस्ट (Component Cost) बढ़ने से प्रभावित हो सकती है। Dixon और IndiGo जैसी ग्रोथ-ओरिएंटेड (Growth-oriented) कंपनियों के P/E रेशियो फिलहाल ऊंचे लग रहे हैं, जो ग्रोथ में कमी या लागत बढ़ने पर बड़ी गिरावट का जोखिम पैदा करते हैं।
आगे का रास्ता: सावधानी के साथ उम्मीद
घरेलू स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर और कंजम्पशन से रिकवरी के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं अभी भी हावी हैं। Bharat Dynamics जैसे कुछ प्रमुख शेयरों पर एनालिस्ट्स का नजरिया 'न्यूट्रल' है, जो सतर्कता दिखाता है। इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (Industrial Production) में ग्रोथ और मजबूत क्रेडिट एक्सपेंशन (Credit Expansion) जारी रहने की उम्मीद है।
ऐसे में, निवेशकों को अपना पोर्टफोलियो (Portfolio) चुनते समय सतर्क रहना चाहिए। उन्हें ऐसी कंपनियों पर ध्यान देना चाहिए जिनकी बैलेंस शीट मजबूत हो, जिनमें प्राइसिंग पावर (Pricing Power) हो और जो इन्फ्लेशन के दबाव को झेल सकें। साथ ही, ग्लोबल भू-राजनीतिक घटनाओं से जुड़े डाउनसाइड रिस्क (Downside Risk) के प्रति भी जागरूक रहना जरूरी है।
