Mutual Funds का AUM ₹81 लाख करोड़ पार! पर क्या छुपी हैं खतरे की घंटी?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Mutual Funds का AUM ₹81 लाख करोड़ पार! पर क्या छुपी हैं खतरे की घंटी?
Overview

भारत की म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री ने जनवरी 2026 तक **₹81.01 लाख करोड़** के एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) का आंकड़ा पार कर लिया है। इस भारी उछाल की मुख्य वजह पैसिव फंड्स में **37.7%** की सालाना ग्रोथ और रिटेल निवेशकों का बढ़ता निवेश है।

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पैसिव फंड का दबदबा और मार्जिन पर दबाव

भारत में म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का कुल AUM ₹81.01 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें पैसिव फंड्स का AUM अकेले 37.7% बढ़कर ₹15.02 लाख करोड़ हो गया है। यह कुल AUM का 19% हिस्सा है। यह साफ दिखाता है कि निवेशक अब कम लागत वाले इंडेक्स फंड्स और ETFs की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। जहां एक्टिव फंड्स 1% से 2.5% तक का एक्सपेंस रेशियो (Fee) लेते हैं, वहीं पैसिव फंड्स का यह शुल्क 0.05% से 0.5% के बीच होता है। इस वजह से एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) के लिए प्रॉफिट मार्जिन पर भारी दबाव आ रहा है, क्योंकि कम फीस वाले फंड्स उनके रेवेन्यू पूल को पतला कर रहे हैं।

रिटेल निवेशकों का बढ़ता दखल और मार्केट को सहारा

इंडस्ट्री के कुल AUM में रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी अब 60% है। पिछले 10 सालों में इन निवेशकों के एसेट्स में 23% की सालाना ग्रोथ देखी गई है, जो इंडस्ट्री के 20% के CAGR से भी ज्यादा है। सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान्स (SIPs) इस ग्रोथ का एक अहम जरिया हैं, जिन्होंने जनवरी 2026 में ही ₹31,002 करोड़ का मासिक इनफ्लो दर्ज किया। यह पिछले साल के मुकाबले 17% ज्यादा है। खास बात यह है कि इसी दौरान फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने $20 बिलियन (लगभग ₹1.66 लाख करोड़) का भारी बिकवाली की, जिसे भारतीय रिटेल निवेशकों के इनफ्लो ने संभाला। यह दिखाता है कि मार्केट में अब रिटेल पैसा एक बड़े सहारे के तौर पर मौजूद है, जो 'Buy the Dip' की स्ट्रैटेजी को बढ़ावा दे रहा है।

ऐतिहासिक बदलाव और मैक्रो फैक्टर

हालांकि इंडस्ट्री का AUM पिछले दशक में 20% की रफ्तार से बढ़ा है, लेकिन फंड्स की बनावट में बड़ा बदलाव आया है। 2015-2016 के आसपास कुल AUM ₹12-13.5 लाख करोड़ के करीब था, लेकिन तब पैसिव फंड्स और रिटेल भागीदारी का दबदबा आज जैसा नहीं था। अमेरिकी मार्केट के 8% CAGR के मुकाबले यह 20% की ग्रोथ भारत की तेज फाइनेंशियल सैंडलाइज़ेशन (Financialisation) को दर्शाती है। मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर्स, जैसे इंटरेस्ट रेट्स, भी फंड पर असर डालते हैं। बढ़ती ब्याज दरें बॉन्ड की कीमतों को गिराकर डेट फंड्स पर और कंपनियों के कर्ज को महंगा करके इक्विटी फंड्स पर नेगेटिव असर डाल सकती हैं।

रेगुलेटरी कदम और भविष्य की राह

सेबी (SEBI) भी इंडस्ट्री के बदलते स्वरूप को देखते हुए कदम उठा रहा है। 'म्यूचुअल फंड्स लाइट' (MF Lite) जैसे नए फ्रेमवर्क लाए जा रहे हैं ताकि इंडेक्स फंड्स और ETFs जैसे पैसिव फंड्स के लिए नियम आसान हो सकें। साथ ही, सेबी ने यह भी तय किया है कि पैसिव फंड्स अपनी NAV का अधिकतम 25% ही स्पॉन्सर ग्रुप की कंपनियों में निवेश कर पाएंगे, जबकि इक्विटी ETFs और इंडेक्स फंड्स के लिए यह सीमा 35% तक हो सकती है। इसका मकसद पारदर्शिता बढ़ाना और सेंट्रलाइजेशन रिस्क को कम करना है।

चिंता के पहलू: लिक्विडिटी, फीस और स्ट्रक्चरल रिस्क

इन सबके बावजूद, कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है। पैसिव फंड्स की बढ़ती हिस्सेदारी से एसेट मैनेजरों की कमाई (Fees) लगातार घट रही है, जिससे लंबे समय में प्रॉफिटेबिलिटी और इनोवेशन पर असर पड़ सकता है। मार्केट अब रिटेल इनफ्लो पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गया है, खासकर FPI के आउटफ्लो को बैलेंस करने के लिए। अगर यह रिटेल इनफ्लो धीमा पड़ता है या अचानक बड़ा रिडेम्पशन (Redemption) होता है, तो मार्केट में लिक्विडिटी का बड़ा संकट पैदा हो सकता है। यह सेगमेंट अब मार्केट को संभालने का मुख्य जरिया बन गया है, जो एक स्ट्रक्चरल वल्नरेबिलिटी (Structural Vulnerability) है। साथ ही, AUM का कुछ राज्यों में ज्यादा केंद्रित होना और इंटरेस्ट रेट्स के प्रति डेट-हैवी पोर्टफोलियो की संवेदनशीलता भी चिंता का विषय है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.