Indian Equities Lagged Global Peers: 2025 में क्यों पिछड़ा Dalal Street? छोटे शेयरों में निवेश का सही दांव या जाल?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Indian Equities Lagged Global Peers: 2025 में क्यों पिछड़ा Dalal Street? छोटे शेयरों में निवेश का सही दांव या जाल?
Overview

साल 2025 भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों के लिए कुछ खास नहीं रहा। जहाँ एक तरफ ग्लोबल मार्केट्स **20%** से ज़्यादा का शानदार रिटर्न दे रहे थे, वहीं इंडियन इक्विटीज सिर्फ **8-10%** के मामूली उछाल पर सिमट गईं। लगातार 10 साल की तेजी के बाद यह पिछड़ापन कुछ चिंता का विषय है।

2025 में क्यों पिछड़ा भारतीय शेयर बाजार?

साल 2025 में भारतीय शेयर बाजार ने 10.7% के आसपास की मामूली बढ़त दर्ज की, जो लगातार 10वीं बार रहा कि निफ्टी 50 ने साल का अंत हरे निशान में किया। लेकिन, यह प्रदर्शन ग्लोबल बेंचमार्क के मुकाबले काफी फीका रहा। जापान और साउथ कोरिया जैसे मार्केट्स ने जहां 20% से अधिक का रिटर्न दिया, वहीं MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स 34% की तूफानी तेजी के साथ भारतीय बाजारों से कहीं आगे निकल गया। घरेलू निवेश (domestic inflows) के बावजूद, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली, लगातार ऊंचे वैल्यूएशन (valuations) और कंपनियों की कमाई में सुस्ती प्रमुख कारण रहे।

AI का क्रेज और सेक्टर पर असर

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दौर जारी रहा और भारतीय कंपनियों ने इसमें भारी निवेश की योजना बनाई। IT सेक्टर, जो भारत की ग्रोथ का अहम इंजन रहा है, AI को अपनाने में सबसे आगे है। हालांकि, 2025 में बाजार की बढ़त काफी केंद्रित रही। ज्यादातर तेजी लार्ज-कैप स्टॉक्स में देखी गई, जिन्हें AI या मजबूत नतीजों का फायदा मिला। वहीं, कई मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों को संघर्ष करना पड़ा, जिससे बाजार की असली तस्वीर पर सवाल उठे।

स्मॉल-कैप में निवेश: मौका या जोखिम?

बाजार की इस चाल के बीच, कई एनालिस्ट्स ने हाल की गिरावट का फायदा उठाते हुए स्मॉल और मिड-कैप शेयरों में निवेश बढ़ाने की सलाह दी। निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स ने 2025 में करीब 7-9% की गिरावट दर्ज की, जो 2022 के बाद इसका सबसे खराब प्रदर्शन रहा। एनालिस्ट्स का मानना है कि यह निवेशकों के लिए अच्छे एंट्री पॉइंट्स (entry points) हो सकते हैं।

वैल्यूएशन का जाल और कमाई का संकट

लेकिन, यह रणनीति जोखिमों से भरी है। स्मॉल और मिड-कैप शेयरों का वैल्यूएशन अभी भी काफी बढ़ा हुआ है। मिड-कैप का फॉरवर्ड पीई रेश्यो (forward P/E ratio) 29.2x और स्मॉल-कैप का 25.1x है, जो उनके लॉन्ग-टर्म एवरेज से काफी ऊपर है। इसके अलावा, फाइनेंशियल ईयर 2026 की दूसरी छमाही में स्मॉल-कैप सेगमेंट की लगभग 40% कंपनियों ने उम्मीदों से कम कमाई की, जिससे इस सेगमेंट की कमाई में 5% की सालाना गिरावट आई। यह चिंताजनक है कि निफ्टी 500 के करीब 73% स्टॉक्स अपने रिकॉर्ड हाई से 10% से ज़्यादा नीचे रहे।

रेगुलेटरी और ग्लोबल फैक्टर्स

निवेशकों की नजर कुछ अहम रेगुलेटरी और ट्रेड डेवलपमेंट पर भी है। भारत-यूरोपियन यूनियन (EU) फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से फार्मा और टेक्सटाइल जैसे सेक्टर्स को फायदा होने की उम्मीद है। भारत-यूएसए ट्रेड डील से भी एक्सपोर्ट्स पर सकारात्मक असर दिख सकता है। वहीं, बजट 2026 में इंफ्रास्ट्रक्चर और डोमेस्टिक ग्रोथ पर जोर, जैसे केपेक्स (capex) में बढ़ोतरी, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा, और बायोफार्मा व रेलवे में पहलें शामिल हैं। ग्लोबल लेवल पर, ब्याज दरों में नरमी और अमेरिकी डॉलर का कमजोर होना इमर्जिंग मार्केट्स के लिए फायदेमंद हो सकता है। लेकिन, EU के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे नियम भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए चुनौतियां पेश कर सकते हैं।

आगे क्या?

2026 के लिए भारतीय इक्विटीज का आउटलुक सतर्कता के साथ आशावादी है। सुधरती कमाई, स्थिर आर्थिक ग्रोथ और 2025 की तुलना में अधिक उचित वैल्यूएशन से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। एनालिस्ट्स का मानना है कि बाजार का प्रदर्शन द्विभाजित (bifurcated) रह सकता है, जिसमें चुनिंदा स्टॉक्स को इनाम मिलेगा। AI में ग्लोबल ट्रेंड और सपोर्टिव मैक्रो पॉलिसीज़ एक अच्छा माहौल बना सकती हैं, लेकिन स्मॉल-कैप्स में बढ़े हुए वैल्यूएशन और संभावित रेगुलेटरी बाधाओं जैसे जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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