FPIs की बंपर खरीदारी, MFs की निकासी: भारत के बाज़ार में क्यों है ये अनोखी चाल?

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AuthorMehul Desai|Published at:
FPIs की बंपर खरीदारी, MFs की निकासी: भारत के बाज़ार में क्यों है ये अनोखी चाल?
Overview

इस महीने भारतीय शेयर बाज़ार में निवेशकों के बीच एक अनोखी चाल देखने को मिल रही है। विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) भारी मात्रा में खरीदारी कर रहे हैं, लगभग **₹25,000 करोड़** का निवेश किया है, जो सितंबर 2024 के बाद सबसे बड़ी इनफ्लो है। वहीं, दूसरी ओर, डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड्स (MFs) बिकवाली कर रहे हैं और करीब **₹1,000 करोड़** निकाल चुके हैं, जो अप्रैल 2023 के बाद पहली मासिक आउटफ्लो है।

निवेशकों के दो अलग-अलग रास्ते

भारतीय शेयर बाज़ार में इस समय निवेशकों के सेंटीमेंट में बड़ा अंतर साफ दिख रहा है। विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) घरेलू शेयरों में आक्रामक तरीके से पैसा लगा रहे हैं, जबकि डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड्स (MFs) पैसा निकाल रहे हैं। इस महीने FPIs ने लगभग ₹25,000 करोड़ का निवेश किया है, जो सितंबर 2024 के बाद सबसे बड़ा नेट इनफ्लो है। यह पिछले तेरह महीनों से चल रहे ₹2 ट्रिलियन की बिकवाली के दौर के लिए एक बड़ी राहत है।

इसके बिल्कुल उलट, MFs ने अपना लगातार सपोर्ट बंद कर दिया है और अप्रैल 2023 के बाद पहली बार लगभग ₹1,000 करोड़ की मासिक आउटफ्लो दर्ज की है। यह एक महत्वपूर्ण दौर का अंत है, जब 2025 के बाद से MFs ने करीब ₹5.5 ट्रिलियन का निवेश किया था। बाज़ार के जानकारों का मानना है कि डोमेस्टिक फंड मैनेजर्स की यह बिकवाली मुख्य रूप से प्रॉफिट बुकिंग (Profit Booking) और पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग (Portfolio Rebalancing) के लिए है, ताकि वे ग्लोबल मैक्रो इकोनॉमिक इवेंट्स और आने वाली अर्निंग्स रिपोर्ट्स से संभावित वोलेटिलिटी (Volatility) से निपट सकें। वे इस अनुमानित उथल-पुथल से निपटने के लिए कैश होल्डिंग्स (Cash Holdings) बढ़ा रहे हैं।

इमर्जिंग मार्केट्स में विदेशी फ्लो, भारत पीछे

विदेशी निवेशकों की यह बढ़ी हुई दिलचस्पी इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) के लिए एक बड़े ग्लोबल ट्रेंड का हिस्सा है। चीन, ताइवान, थाईलैंड और ब्राजील जैसे देशों ने भी इस महीने सकारात्मक कैपिटल फ्लो देखा है, जिसका श्रेय ग्लोबल रिस्क एपेटाइट (Risk Appetite) में सुधार और डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) थीम को दिया जा रहा है। ग्लोबल इमर्जिंग मार्केट इक्विटी फंड्स 2016-18 के साइकल के बाद से सबसे मजबूत इनफ्लो फेज में से एक का अनुभव कर रहे हैं, और भारत, एक प्रमुख EM होने के नाते, इससे लाभान्वित होने की उम्मीद है। हालिया करेक्शन्स (Corrections) के बाद भारतीय बाज़ार के कुछ हिस्सों में आकर्षक वैल्यूएशंस (Valuations) ने भी इन इनफ्लो में मदद की है।

हालांकि, विदेशी पूंजी के भारी निवेश के बावजूद, भारतीय इक्विटी ने ग्लोबल पीयर्स (Global Peers) के मुकाबले कम प्रदर्शन किया है। निफ्टी 50 इंडेक्स ने इस महीने सिर्फ 0.7% का मामूली लाभ दर्ज किया है। इसकी तुलना में, दक्षिण कोरिया 20% से अधिक उछला है, और थाईलैंड व जापान दोनों लगभग 10% चढ़े हैं। निफ्टी 50 का साल-दर-तारीख (Year-to-Date) प्रदर्शन USD टर्म्स में -3% रहा है, जिसका मुख्य कारण IT सर्विस सेक्टर रहा है, जिसमें लगभग 15% की गिरावट आई है।

भारतीय IT पर AI का साया

इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) सेक्टर में यह महत्वपूर्ण अंडरपरफॉर्मेंस (Underperformance) विशेष ध्यान देने योग्य है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े डिफ्लेशनरी प्रेशर (Deflationary Pressures) को लेकर जो डर है, वह IT सर्विस कंपनियों के वैल्यूएशंस को प्रभावित कर रहा है। कुछ एनालिस्ट्स (Analysts) जैसे नोमुरा (Nomura) इन चिंताओं को समय से पहले बता रहे हैं और सेक्टर में पुनर्गठन की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि, अन्य रिपोर्ट्स अधिक सतर्क दृष्टिकोण दिखाती हैं। जेफरीज (Jefferies) और कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज (Kotak Institutional Equities) जैसे ब्रोकरेज का कहना है कि AI-संचालित ऑटोमेशन (Automation) उन एप्लीकेशन सर्विसेज रेवेन्यू (Application Services Revenues) को कम कर सकता है, जो कई भारतीय IT फर्मों की आय का एक बड़ा हिस्सा हैं। इसके चलते TCS, Infosys और HCLTech जैसे प्रमुख IT प्लेयर्स के लिए डाउनग्रेड (Downgrade) हुए हैं, और कुछ विश्लेषक AI की वजह से होने वाले व्यवधान के कारण वैल्यूएशन में और कमी की चेतावनी दे रहे हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भी एक उल्लेखनीय बदलाव दिखाया है; उन्होंने 2025 में भारतीय IT कंपनियों के शेयरों में $8,755 मिलियन की नेट बिकवाली की है।

स्ट्रक्चरल कमजोरियां और वैल्यूएशन चिंताएं

भारत की लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) लगभग ₹203.38 लाख करोड़ है, जबकि निफ्टी 50 इंडेक्स लगभग 22.3 के प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो पर ट्रेड कर रहा है। हालांकि FPI इनफ्लो ऐतिहासिक रूप से प्रमुख सूचकांकों को सपोर्ट करते हैं, लगातार तेज़ी के लिए व्यापक निवेशक भागीदारी की आवश्यकता होती है। FPIs पर वर्तमान निर्भरता, और MFs की टैक्टिकल सेलिंग (Tactical Selling), एक संभावित कमजोरी पेश करती है।

ऐतिहासिक रूप से, FPI फ्लो एक महत्वपूर्ण ड्राइवर रहा है, लेकिन जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है और अधिक लचीली बनी है, प्रमुख सूचकांकों पर उनका प्रभाव कम हुआ है। फिर भी, लगातार आउटफ्लो लिक्विडिटी (Liquidity) और करेंसी स्टेबिलिटी (Currency Stability) को प्रभावित कर सकता है। भारतीय रुपये का कमजोर होना भी विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का विषय रहा है, जिससे करेंसी कन्वर्जन (Currency Conversion) कम अनुकूल हो गया है और इमर्जिंग मार्केट्स के प्रति सतर्कता बढ़ गई है। भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) और अमेरिकी आर्थिक दृष्टिकोण में अनिश्चितता सहित व्यापक वैश्विक संदर्भ इस सतर्कता को और बढ़ाता है।

आगे क्या? (Future Outlook)

बाज़ार की दिशा विदेशी इनफ्लो की निरंतरता और डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स के नेट बायर्स के तौर पर वापस आने पर निर्भर करती है। वैल्यूएशंस का स्थिरीकरण और बेहतर अर्निंग्स विजिबिलिटी (Earnings Visibility) इस डोमेस्टिक री-एंगेजमेंट (Re-engagement) के लिए महत्वपूर्ण शर्तें हैं। AI का महत्वपूर्ण IT सर्विस सेक्टर पर प्रभाव, खासकर चल रहे तकनीकी बदलाव, कॉरपोरेट अर्निंग्स और समग्र बाज़ार भावना को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बना रहेगा। भू-राजनीतिक तनावों का कोई भी बढ़ना या प्रतिकूल ग्लोबल मैक्रो-इकोनॉमिक डेटा रिस्क एपेटाइट (Risk Appetite) को और कम कर सकता है, जिससे संभावित रूप से अधिक अस्थिरता आ सकती है। विश्लेषकों की राय बंटी हुई है; कुछ IT सेक्टर की अनुकूलन क्षमता में अवसर देख रहे हैं, जबकि अन्य संरचनात्मक राजस्व क्षरण (Structural Revenue Erosion) और डाउनग्रेड की चेतावनी दे रहे हैं।

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