'विविधीकरण' का पुराना फॉर्मूला हुआ फेल?
सदियों से निवेशकों का एक बड़ा मंत्र रहा है कि अपने पैसे को अलग-अलग एसेट क्लास में बाँट दो, ताकि जोखिम कम हो सके। इसे ही 'विविधीकरण' कहते हैं। लेकिन अब यह सिद्धांत बड़ा मुश्किल में पड़ गया है। वजह है ग्लोबल इकॉनमी का आपस में ज़्यादा जुड़ना, दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों की एक जैसी नीतियां और खबरों का तेज़ी से फैलना। इन सबने मिलकर एसेट क्लास के बीच की 'कोरिलेशन' (Correlation) बढ़ा दी है, यानी वे ज़्यादातर एक साथ ही रिएक्ट करती हैं। इससे मार्केट में जब कोई बड़ी गिरावट आती है, तो एक एसेट क्लास को बचाकर दूसरी में जाने का फायदा कम हो गया है।
अनकोरिलेटेड एसेट्स और नए रास्ते
इस बदलती तस्वीर में, निवेशक अब उन एसेट्स और स्ट्रैटेजीज़ की तलाश कर रहे हैं जिनका मुख्य मार्केट से कोई सीधा रिश्ता न हो या बहुत कम हो। इसमें 'ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट' (Alternative Investments) का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है। जैसे कुछ खास तरह की 'लिटिगेशन फंडिंग' (Litigation Funding), 'ड्रग ट्रायल फंडिंग' (Drug Trial Funding) या 'रॉयल्टी-आधारित निवेश' (Royalty-based Investments) जो किसी खास घटना पर निर्भर करते हैं। इसके अलावा, 'मैनेज्ड फ्यूचर्स' (Managed Futures), 'इंफ्रास्ट्रक्चर' (Infrastructure) जैसे रियल एसेट्स और 'इक्विटी लॉन्ग/शॉर्ट' (Equity Long/Short - ELS) जैसी हेज फंड स्ट्रैटेजीज़ भी लोगों का ध्यान खींच रही हैं। अनुमान है कि 2026 तक ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट का बाज़ार $23 ट्रिलियन से भी ज़्यादा का हो जाएगा।
एक्टिव मैनेजमेंट की बढ़ी ज़रूरत
सिर्फ अपने पैसों को बिखेर देना अब काफी नहीं होगा। खासकर तब, जब S&P 500 जैसे बड़े इंडेक्स में कुछ ही बड़ी कंपनियों का दबदबा है। ऐसे में, 'एक्टिव मैनेजमेंट' (Active Management) यानी किसी एक्सपर्ट फंड मैनेजर द्वारा पोर्टफोलियो को सक्रिय रूप से मैनेज करना, बहुत ज़रूरी हो गया है। ये मैनेजर्स मार्केट की कमजोरियों को पहचान सकते हैं, बदलते कोरिलेशन के हिसाब से खुद को ढाल सकते हैं और ऐसे पोर्टफोलियो बना सकते हैं जो मार्केट की गिरावट में भी टिके रहें।
आगे का रास्ता: सिर्फ़ फैलाने से नहीं, मैनेज करने से बनेगा काम
यह सब क्यों हो रहा है? ग्लोबल जुड़ाव, सेंट्रल बैंकों की लिक्विडिटी (Liquidity) और ब्याज दरों का बढ़ना, इन सबका बड़ा असर है। आने वाले समय में, इकोनॉमिक नेशनलिज्म (Economic Nationalism), सरकारी खर्च और 'AI' जैसी नई टेक्नोलॉजीज़ भी यह तय करेंगी कि एसेट क्लास कैसे जुड़ेंगी। इसलिए, निवेशकों को अब सिर्फ जोखिम फैलाने से आगे बढ़कर, 'अनकोरिलेटेड रिस्क' (Uncorrelated Risk) को सक्रिय रूप से मैनेज करने पर ध्यान देना होगा।