भारतीय ऑटो एंसिलरी कंपनियां अब केवल व्हीकल बिजनेस तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। अपने मुनाफे को सुरक्षित करने और डिमांड की अनिश्चितता से बचने के लिए ये कंपनियां डिफेंस, एयरोस्पेस और रेलवे जैसे हाई-ग्रोथ सेक्टर्स में एंट्री कर रही हैं।
सेक्टर में बदलाव की बयार
सालों तक ऑटो कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स पूरी तरह से पैसेंजर और कमर्शियल व्हीकल की डिमांड पर निर्भर रहे हैं। लेकिन अब माहौल बदल रहा है। ये कंपनियां अपनी 'प्रेसिजन इंजीनियरिंग' स्किल्स का इस्तेमाल डिफेंस, एयरोस्पेस, रेलवे, सेमीकंडक्टर और डेटा सेंटर्स जैसे नए क्षेत्रों में कर रही हैं। इसका सीधा उद्देश्य रेवेन्यू को स्थिर करना है ताकि व्हीकल सेल्स की साइक्लिकल (Cyclical) गिरावट का असर कम हो सके।
कौन सी कंपनियां हैं रेस में?
कई दिग्गज कंपनियां इस रणनीति पर तेजी से काम कर रही हैं। Sansera Engineering, Craftsman Automation और NRB Bearings ने एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर में अपनी दावेदारी मजबूत कर ली है। वहीं, Pricol अपनी बिजनेस स्ट्रक्चरिंग पर जोर दे रही है, ताकि एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स पर फोकस बढ़ सके। Rane (Madras) भी रणनीतिक अधिग्रहण (Strategic Acquisitions) के जरिए अपना विस्तार कर रही है, जैसा कि हाल ही में Hindustan Composites की फ्रिक्शन बिजनेस डील में देखा गया।
फाइनेंशियल टारगेट और मार्जिन का गणित
इस बदलाव के पीछे ठोस गणित है। इंडस्ट्री का लक्ष्य FY30 तक 10% की सालाना रेवेन्यू ग्रोथ हासिल करना है। चूंकि डिफेंस और एयरोस्पेस में मार्जिन ज्यादा होता है, इसलिए जानकारों का अनुमान है कि कंपनियों का EBITDA (ऑपरेटिंग प्रॉफिट) इस दौरान 15% की दर से बढ़ सकता है। इससे उन्हें मास-मार्केट सेगमेंट के भारी प्राइस प्रेशर से राहत मिलेगी।
चुनौतियां और रिस्क
हालांकि ग्रोथ की राह में कुछ बाधाएं भी हैं। डिफेंस और एयरोस्पेस में एंट्री इतनी आसान नहीं है; यहां सख्त क्वालिफिकेशन प्रोसेस से गुजरना पड़ता है, जिसमें समय अधिक लगता है। साथ ही, जो कंपनियां सिर्फ इंटरनल कम्बशन इंजन (ICE) पर निर्भर हैं, उन्हें इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) ट्रेंड के साथ तालमेल बिठाना होगा। इसके अलावा, यूरोप जैसे बाजारों में एक्सपोर्ट संबंधी दिक्कतें भी कंपनियों के मुनाफे पर असर डाल सकती हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि ये कंपनियां कितनी तेजी से अपने ऑर्डर बुक को असल रेवेन्यू में बदल पाती हैं।
