Venture Capital फर्में अब स्टार्टअप फाउंडर्स की जांच के लिए 'Level II' बैकग्राउंड चेक अपना रही हैं। वे केवल फाइनेंशियल डेटा पर निर्भर रहने के बजाय अब लीडर्स के व्यवहार और काम करने के तरीके की गहराई से पड़ताल कर रही हैं ताकि भविष्य में होने वाली गवर्नेंस की गलतियों को रोका जा सके।
फाइनेंशियल रिपोर्ट्स से परे की हकीकत
सालों तक Venture Capital (VC) इंडस्ट्री का पूरा जोर 'डेटा रूम' मॉडल पर रहा है। इसमें फाइनेंशियल स्टेटमेंट, कैप टेबल और कस्टमर कॉन्ट्रैक्ट्स की जांच की जाती है। ये दस्तावेज कंपनी की आर्थिक सेहत तो बताते हैं, लेकिन उस कंपनी को चलाने वाले इंसान की नियत और लीडरशिप का पता नहीं चलता। भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम अब परिपक्व हो रहा है और निवेशक समझ रहे हैं कि कंपनी की सफलता सिर्फ बिजनेस मॉडल पर नहीं, बल्कि लीडर की ईमानदारी पर भी टिकी है।
'Level I' और 'Level II' में क्या अंतर है?
पारंपरिक 'Level I' चेक में क्रेडिट हिस्ट्री, पब्लिक रिकॉर्ड और कानूनी विवादों की जांच होती है। लेकिन ये तरीके पुराने हैं और अक्सर ये नहीं बता पाते कि मुश्किल समय में फाउंडर कैसा बर्ताव करेगा। हाल के दिनों में स्टार्टअप्स में हुई गवर्नेंस की गड़बड़ियों ने यह साबित कर दिया है कि फाइनेंशियल अनुशासन ही सब कुछ नहीं है।
अब निवेशक 'Level II' डेलिजेंस की ओर बढ़ रहे हैं। इसमें फाउंडर के पूर्व कर्मचारियों, सप्लायर्स और इंडस्ट्री के साथियों से गोपनीय बातचीत की जाती है। इसका मकसद गपशप करना नहीं, बल्कि यह देखना है कि लीडर संघर्ष के समय कैसा व्यवहार करता है और क्या उसमें फेलियर को संभालने का माद्दा है।
भरोसे का नया पैमाना
Arkam Ventures के CFO विष्णुहरी पारेख ने इस व्यवस्थित तरीके को जरूरी बताया है। उनका मानना है कि निवेश करने से पहले यह देखना जरूरी है कि क्या फाउंडर में कंपनी को स्केल करने का धैर्य है। कई अलग-अलग सूत्रों से फीडबैक लेकर निवेशक यह तय करते हैं कि क्या फाउंडर में कोई 'रेड फ्लैग' तो नहीं है।
भारतीय मार्केट में यह एक बड़ा बदलाव है। SEBI जैसी रेगुलेटरी संस्थाओं की बढ़ती निगरानी के बीच, अब सस्टेनेबल गवर्नेंस प्राथमिकता बन गई है। अब पारदर्शिता और बेहतर बोर्ड मैनेजमेंट उन स्टार्टअप्स की पहचान बन रहे हैं, जो लंबे समय के लिए सुरक्षित और टिकाऊ निवेश आकर्षित कर सकते हैं।
