आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेजी के बीच वेंचर कैपिटल (VC) फर्म्स अब अपने पुराने 'नो-राइवल' नियम को खत्म कर रही हैं। अब VC फर्म्स उन स्टार्टअप्स में भी पैसा लगा रही हैं जो आपस में एक-दूसरे के कंपटीटर हैं, जिससे मार्केट में ट्रांसपेरेंसी और गवर्नेंस पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।
वेंचर कैपिटल की दुनिया में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले VC फर्म्स इस बात का खास ख्याल रखती थीं कि वे ऐसी कंपनियों में निवेश न करें जो सीधे तौर पर एक-दूसरे की राइवल हों, ताकि कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट से बचा जा सके। लेकिन AI टेक्नोलॉजी ने सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट की लागत को इतना कम कर दिया है कि स्टार्टअप्स बहुत तेजी से अपने बिजनेस मॉडल बदल रहे हैं, जिससे पुराने नियम अब बेमानी होते जा रहे हैं।
क्यों बदल रही है रणनीति?
अब स्टार्टअप्स इतनी जल्दी अपने एरिया को बढ़ा रहे हैं कि जो कंपनियां पहले अलग-अलग नीश (niche) में थीं, वे अब एक-दूसरे के मार्केट में घुसपैठ कर रही हैं। इसके चलते एक VC फर्म के पोर्टफोलियो में अब ऐसी कई कंपनियां हो गई हैं जो आपस में भिड़ रही हैं।
गवर्नेंस और ट्रांसपेरेंसी की चुनौती
इस बदलाव ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस के सामने नए खतरे पैदा कर दिए हैं। जब एक ही इन्वेस्टर दो राइवल कंपनियों में निवेश करता है, तो बोर्ड रूम के फैसलों और कॉन्फिडेंशियल डेटा के लीक होने का रिस्क बढ़ जाता है। हाल ही में Factory और Cognition जैसे स्टार्टअप्स से जुड़ी घटनाओं ने इस बहस को और तेज कर दिया है। दिग्गज इन्वेस्टर Vinod Khosla जैसे दिग्गज भी अब इस बात पर जोर दे रहे हैं कि कंपनियों की इंटीग्रिटी को बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
फाउंडर्स के लिए नया संकेत
Benchmark जैसी बड़ी फर्म्स अब 'एक्सक्लूसिविटी' की जगह 'अर्ली डिस्क्लोजर' यानी समय रहते जानकारी देने के मॉडल पर काम कर रही हैं। अब फाउंडर्स को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि उनका बैकर्स सिर्फ उन्हीं पर फोकस करेगा। इंडियन स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए भी यह एक बड़ा सबक है, क्योंकि भारत में भी AI-आधारित स्टार्टअप्स की संख्या बढ़ रही है। भविष्य में वही फर्म्स और फाउंडर्स सफल रहेंगे जो कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट को मैनेज करने के लिए पारदर्शी रूल्स और एथिकल बाउंड्रीज तय करेंगे।
