TDK Ventures के प्रेसिडेंट Nicolas Sauvage ने बताया कि भारत के डीप-टेक सेक्टर में अनुभवी संस्थापकों (Repeat Founders) की कमी है। डीप-टेक स्टार्टअप्स को मैच्योर होने में **6 से 8 साल** का समय लगता है, जो सॉफ्टवेयर स्टार्टअप्स के मुकाबले काफी ज्यादा है। कंपनी भारत में **$500 मिलियन** के फंड के साथ लॉन्ग-टर्म इनोवेशन पर दांव लगा रही है।
TDK Ventures के प्रेसिडेंट Nicolas Sauvage ने भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम की एक बड़ी सच्चाई सामने रखी है। जहां भारत में सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस (SaaS) कंपनियां 4 से 5 साल के भीतर एग्जिट या मैच्योरिटी तक पहुंच जाती हैं, वहीं हार्डवेयर, एनर्जी स्टोरेज और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे डीप-टेक स्टार्टअप्स को अपनी तकनीक साबित करने में लंबा समय लगता है। इस कारण अनुभवी संस्थापकों की कमी हो रही है, क्योंकि एक ही वेंचर में 10 साल तक उलझे रहने के कारण वे अगले नए आइडिया पर काम नहीं कर पाते।
लंबी अवधि की चुनौतियां
सॉफ्टवेयर और डीप-टेक के बीच सबसे बड़ा फर्क 'जेस्टेशन पीरियड' (Gestation Period) का है। डीप-टेक स्टार्टअप्स को भारी हार्डवेयर सेटअप, रिसर्च और रेगुलेटरी अनुपालन की जरूरत होती है। Sauvage के अनुसार, 6 से 8 साल के इस लंबे सफर के कारण 'वेटरन फाउंडर क्लास' नहीं बन पा रही है, जो पुराने अनुभवों का लाभ उठाकर नए इनोवेशन को रफ्तार दे सके।
TDK Ventures की रणनीति
जापान की दिग्गज कंपनी TDK Corporation की आर्म, TDK Ventures, भारत में $500 मिलियन के चार फंड्स के जरिए निवेश कर रही है। इनका लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक अलाइनमेंट है। भारत में इनकी पोर्टफोलियो कंपनियों में Ultraviolette Automotive, Exponent Energy, C2i Semiconductors, EtherealX और Fasal जैसे नाम शामिल हैं।
निवेशकों के लिए जोखिम और जरूरी बातें
डीप-टेक में निवेश करने वाले निवेशकों को यह समझना होगा कि यह सेक्टर कैपिटल-इंटेंसिव है। इसमें टेक्नोलॉजी वैलिडेशन में देरी और एग्जीक्यूशन रिस्क जैसे जोखिम हमेशा बने रहते हैं। इसके अलावा, ग्लोबल सप्लाई चेन और क्रिटिकल मटेरियल पर व्यापारिक पाबंदियां भी TDK जैसी वैश्विक कंपनियों की रणनीति को प्रभावित कर सकती हैं। आने वाले समय में इन स्टार्टअप्स का कमर्शियल स्केल हासिल करना ही सफलता का असली पैमाना होगा।
