एक स्टार्टअप में काम करने वाले कर्मचारी ने आरोप लगाया है कि कंपनी ने उसे सुबह 2 बजे के वर्क कॉल का जवाब न देने पर डांटा। इस घटना ने वर्कप्लेस कल्चर, सैलरी और प्रोफेशनल बाउंड्रीज पर बहस छेड़ दी है।
2 AM पर कॉल और ऑफिस का ड्रामा
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक घटना सामने आई है जिसने स्टार्टअप्स के वर्क कल्चर और प्रोफेशनल बाउंड्रीज पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक कर्मचारी, जिसकी मासिक सैलरी ₹23,000 है, का आरोप है कि कंपनी ने उससे सुबह 2 बजे एक वर्क रिलेटेड ग्रुप कॉल का जवाब न देने पर उसकी प्रोफेशनलिज्म पर सवाल उठाए।
कर्मचारी के मुताबिक, उसने सुबह 9 से शाम 6 बजे तक की अपनी शिफ्ट पूरी कर ली थी और एक अर्जेंट प्रोजेक्ट की डेडलाइन पर काम कर रहा था। उसने यह भी बताया कि उसे आंखों में खिंचाव (eye strain) महसूस हो रहा था और सोने से पहले दवा ली थी।
मां का फोन उठाना और कंपनी का रिएक्शन
मामला तब और बिगड़ा जब कंपनी ने WhatsApp पर देर रात कॉल करने की कोशिश की। चूंकि कर्मचारी सो रहा था, उसकी मां ने फोन उठाया। कर्मचारी का आरोप है कि कंपनी ने उसकी मां से बात करने के बाद उसकी प्रोफेशनल कमिटमेंट पर सवाल उठाए और कहा कि लंबी शिफ्ट के बाद सोना गलत था। कर्मचारी ने डेडलाइन के प्रेशर को स्वीकार किया, लेकिन कहा कि वर्कप्लेस की समस्या में परिवार को घसीटना प्रोफेशनल बाउंड्रीज को पार करना है।
वर्क कल्चर और सैलरी पर सवाल
इस घटना ने शुरुआती स्टार्टअप्स के हाई-प्रेशर वाले माहौल पर एक बड़ी चर्चा छेड़ दी है। क्रिटिक्स ने कर्मचारी की ₹23,000 की सैलरी के मुकाबले उससे ली जा रही मांगों पर सवाल उठाए हैं। इंडस्ट्री के कई जानकारों का कहना है कि 24/7 उपलब्धता की उम्मीद और बिना पैसे का ओवरटाइम जैसी प्रैक्टिस टैलेंट को बनाए रखने और मैनेजमेंट की क्वालिटी पर सवाल खड़े करती हैं। इनफॉर्मल स्टार्टअप्स में देर रात प्रोफेशनल कम्युनिकेशन के लिए पर्सनल मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल भी एक आम समस्या बताई जा रही है। ऐसे में ईमेल या डेडिकेटेड वर्कस्पेस सॉफ्टवेयर जैसे प्रोफेशनल कम्युनिकेशन टूल्स के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है ताकि स्पष्ट बाउंड्रीज बनी रहें।
यह घटना निवेशकों और प्रोफेशनल्स के लिए छोटी फर्मों में खराब गवर्नेंस और कल्चर से जुड़े जोखिमों को उजागर करती है। हाई एम्प्लॉई टर्नओवर और बर्नआउट अक्सर इनफ्लेक्सिबल वर्क एनवायरनमेंट से जुड़े होते हैं, जो प्रोजेक्ट एक्जीक्यूशन और बिजनेस की लॉन्ग-टर्म वायबिलिटी को प्रभावित कर सकते हैं। भारत में स्टार्टअप इकोसिस्टम के बढ़ने के साथ, कंपनियों का मूल्यांकन सिर्फ उनके ग्रोथ मेट्रिक्स पर ही नहीं, बल्कि उनके HR प्रैक्टिसेस और वर्क कल्चर की सस्टेनेबिलिटी पर भी किया जा रहा है। ऐसी पब्लिक क्रिटिसिज्म का सामना करने वाली किसी भी कंपनी के लिए यह देखना ज़रूरी है कि मैनेजमेंट इन इंटरनल कल्चर इश्यूज को कैसे ठीक करता है ताकि ऑपरेशनल रुकावटों या की-टैलेंट के नुकसान से बचा जा सके।
