अहमदाबाद की डीपटेक कंपनी SpectraGaze Systems ने GVFL के नेतृत्व में **₹3.7 करोड़** की सीड फंडिंग जुटाई है। ISRO के पूर्व वैज्ञानिक द्वारा स्थापित यह कंपनी अब भारत में ही इन्फ्रारेड सेंसर बनाकर विदेशों पर निर्भरता कम करेगी।
अहमदाबाद स्थित इंजीनियरिंग फर्म SpectraGaze Systems ने ₹3.7 करोड़ की सीड फंडिंग हासिल की है, जिसका नेतृत्व GVFL ने किया है। ISRO के पूर्व वैज्ञानिक अरूप बनर्जी द्वारा स्थापित यह कंपनी इन्फ्रारेड डिटेक्टर और इमेजिंग तकनीक के क्षेत्र में काम कर रही है। यह निवेश कंपनी के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है, क्योंकि अब यह एक इंजीनियरिंग सर्विस प्रोवाइडर से बढ़कर एक मैन्युफैक्चरिंग स्टार्टअप बनने की ओर अग्रसर है।
आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम
भारतीय एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए SpectraGaze का मॉडल महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से उपग्रहों, रक्षा निगरानी और टोही उपकरणों के लिए विदेशों से महंगे इन्फ्रारेड सेंसर मंगवाता रहा है। अब स्थानीय स्तर पर ये पुर्जे बनाकर कंपनी सीधे तौर पर 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान और iDEX जैसी सरकारी पहल के साथ जुड़ रही है।
कंपनी ने पहले ही Physical Research Laboratory और Kaynes Technology India Limited जैसे बड़े संस्थानों के साथ काम करना शुरू कर दिया है। Kaynes Technology के साथ उनका कोलैबोरेशन 2026 के अंत तक एक 3U सैटेलाइट प्लेटफॉर्म के लिए हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग कैमरा बनाने का है, जो उनके आरएंडडी (R&D) से कमर्शियल स्टेज तक पहुँचने का प्रमाण है।
डीपटेक सेक्टर में जोखिम की सच्चाई
निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि स्पेस और डिफेंस जैसे डीपटेक सेक्टर में जोखिम भी काफी ज्यादा होते हैं। सॉफ्टवेयर कंपनियों के मुकाबले, यहां आरएंडडी (R&D) में भारी खर्च और रेवेन्यू आने में लंबा वक्त लगता है। iDEX PRIME चैलेंज के तहत 'इन्फ्रारेड डिटेक्टर डियूर कूलर असेंबली' बनाना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण काम है।
कंपनी के लिए मुख्य परीक्षा 'एक्जीक्यूशन' (Execution) की होगी। उन्हें अपने प्रोटोटाइप को ऐसे प्रोडक्ट्स में बदलना होगा जो स्पेस मिशन के कड़े मानकों पर खरे उतर सकें। अगर डेवलपमेंट में देरी होती है या सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स की तकनीकी शर्तों को पूरा करने में चूक होती है, तो इसका असर कंपनी के कैश फ्लो पर पड़ सकता है।
भविष्य की बात करें, तो कंपनी की सफलता 2027 में होने वाले HRSAT मिशन जैसे हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट्स पर टिकी है। बाजार के जानकारों की नजर अब इस पर होगी कि कंपनी अपने ऑर्डर बुक को कैसे पूरा करती है और बढ़ते ऑपरेशनल खर्च को कैसे मैनेज करती है।
