NITI Aayog ने भारत के डीप-टेक स्टार्टअप्स को लैब प्रोटोटाइप से बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन तक ले जाने के लिए **6 महीने** का एक खास स्टडी प्रोग्राम शुरू किया है। इस कदम का मकसद स्टार्टअप्स के लिए जरूरी 'पेशेंट कैपिटल' (Patient Capital) और इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियों को दूर करना है।
डीप-टेक स्टार्टअप्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती
सॉफ्टवेयर या सामान्य स्टार्टअप्स के मुकाबले डीप-टेक कंपनियां पूरी तरह अलग हैं। ये कंपनियां वैज्ञानिक खोजों और जटिल इंजीनियरिंग पर आधारित होती हैं। एक मोबाइल ऐप जहां तेजी से रेवेन्यू जनरेट कर सकता है, वहीं डीप-टेक स्टार्टअप्स को प्रोटोटाइप तक पहुँचने के लिए भी लंबे आरएंडडी (R&D) दौर से गुजरना पड़ता है।
इसी वजह से इन कंपनियों को 'पेशेंट कैपिटल' की जरूरत होती है। पेशेंट कैपिटल का मतलब है ऐसे निवेशक जो तुरंत मुनाफे के बजाय लंबी अवधि के विकास के लिए पैसा लगाने को तैयार हों। मौजूदा समय में फंडिंग की कमी के कारण कई बेहतरीन स्टार्टअप्स शुरुआती स्तर पर ही रुक जाते हैं। सरकार की इस स्टडी का मुख्य लक्ष्य इसी फंडिंग गैप को भरना है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और आत्मनिर्भरता का लक्ष्य
सिर्फ फंडिंग ही नहीं, इस स्टडी में इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी जोर दिया जाएगा। हाई-एंड हार्डवेयर बनाने के लिए महंगे टेस्टिंग सेंटर और डेटा की जरूरत होती है, जो अकेले स्टार्टअप्स के लिए बनाना मुश्किल है। सरकार स्टार्टअप्स, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी बॉडीज के बीच तालमेल बिठाकर इसे आसान बनाना चाहती है, ताकि विदेशी पुर्जों पर निर्भरता कम हो सके।
निवेशकों के लिए रिस्क और रिवॉर्ड
निवेशकों को यह समझना होगा कि इस सरकारी नीति के बावजूद डीप-टेक क्षेत्र अभी भी हाई-रिस्क जोन में है। इसमें फेलियर रेट अधिक होता है क्योंकि इन्हें कई सालों तक लगातार भारी निवेश की जरूरत पड़ती है। सरकार ने स्टार्टअप्स की उम्र सीमा को 20 साल तक बढ़ाने जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन असली परीक्षा कमर्शियल प्रोडक्शन की है। आने वाले समय में इस स्टडी के नतीजे ही तय करेंगे कि भारत ग्लोबल टेक हब बनने की दिशा में कितनी मजबूती से आगे बढ़ पाएगा।
