West Asia Tensions: SWFs का पैसा रुका, Indian Tech IPOs पर बड़ा ब्रेक

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
West Asia Tensions: SWFs का पैसा रुका, Indian Tech IPOs पर बड़ा ब्रेक
Overview

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते, मध्य पूर्व के सॉवरेन वेल्थ फंड्स (SWFs) अब जोखिम भरे टेक निवेश की जगह अपनी क्षेत्रीय संपत्तियों को सुरक्षित करने पर ध्यान दे रहे हैं। इस बड़े बदलाव ने भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम पर असर डाला है, जिससे कई टेक कंपनियों के IPO में देरी हो रही है और लेट-स्टेज कंपनियों का वैल्यूएशन (Valuation) घट रहा है।

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क्यों घबराए SWFs?

पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक उथल-पुथल ने ग्लोबल निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इसी के चलते, मध्य पूर्व के बड़े सॉवरेन वेल्थ फंड्स (SWFs), जो भारत के टेक सेक्टर में बड़ी रकम लगाते आए हैं, अब क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दे रहे हैं। वे अपनी पूंजी को सुरक्षित जगहों पर लगाना चाह रहे हैं, जिसका सीधा असर भारतीय स्टार्टअप्स के लिए फंड जुटाने और पब्लिक होने की राह पर पड़ रहा है।

IPO पाइपलाइन ठप, फंडिंग पर संकट

जो कंपनियां पब्लिक होने की तैयारी कर रही थीं, उन्हें अब अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। इन्वेस्टमेंट बैंकरों ने क्लाइंट्स को सलाह दी है कि जब तक तनाव कम न हो, लिस्टिंग योजनाओं को फिलहाल रोक दें। गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) देशों के SWFs द्वारा भारतीय स्टार्टअप्स में किया जाने वाला निवेश, जो पिछले 5 सालों में करीब $9 अरब था, उसमें भारी गिरावट आई है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में यह निवेश घटकर सिर्फ $225 मिलियन रह गया, जबकि 2024 में यह $389.3 मिलियन था और 2021 में तो यह $6.32 अरब तक पहुंच गया था। ऐतिहासिक तौर पर, ये फंड्स वेंचर कैपिटल (Venture Capital) के अनिश्चित रिटर्न की तुलना में रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी स्थिर संपत्तियों को ज्यादा पसंद करते रहे हैं।

जोखिम भरे टेक से दूर, मुनाफे पर फोकस

मध्य पूर्व के SWFs अब हाई-ग्रोथ, लेकिन ज्यादा जोखिम वाले टेक सेक्टर के दांव से पीछे हट रहे हैं। वे अपनी लिक्विडिटी (Liquidity) को क्षेत्रीय जरूरतों के लिए बचा रहे हैं। हालांकि ये फंड्स दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) और रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश कर रहे हैं, लेकिन उभरते बाजारों (Emerging Markets) के अस्थिर और अर्ली-स्टेज टेक स्टार्टअप्स में उनकी दिलचस्पी कम हुई है। यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब टेक सेक्टर की ग्रोथ से ज्यादा चिंता भू-राजनीतिक जोखिमों को लेकर है।

वैल्यूएशन घटने का डर, M&A की ओर रुझान

आजकल निवेशक सिर्फ तेजी से ग्रोथ करने वाली कंपनियों के बजाय, ऐसे स्टार्टअप्स को तरजीह दे रहे हैं जो स्पष्ट रूप से मुनाफा (Profit) कमा रहे हैं और जिनके बिजनेस मॉडल (Business Models) मजबूत हैं। SWFs के पैसा निकालने के इस ट्रेंड का असर उन लेट-स्टेज कंपनियों पर पड़ रहा है जो नई फंडिंग जुटा रही हैं। उन्हें उम्मीद से काफी कम वैल्यूएशन पर समझौता करना पड़ सकता है। हाल ही में लिस्ट हुई कंपनियों के $15-20 अरब के ब्लॉक डील (Block Deals) के लिए भी खरीदार कम मिल रहे हैं। इसका असर निवेशकों के रिटर्न पर पड़ सकता है और भविष्य में वेंचर कैपिटल (Venture Capital) फंडिंग पर भी असर डालेगा। ऐसे में, वेंचर कैपिटलिस्ट अब डीप टेक (Deep Tech), एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर (Enterprise Software) और क्लाइमेट टेक (Climate Tech) जैसी कंपनियों पर ज्यादा ध्यान देंगे, जहां कमाई की संभावना साफ हो।

भारत पर आर्थिक मार

पश्चिम एशिया में अस्थिरता ग्लोबल निवेशकों के जोखिम से बचाव (Risk Aversion) को बढ़ाती है, जिसका असर खासकर उभरते बाजारों पर पड़ता है। भारत के लिए, यह संघर्ष एक बड़ी आर्थिक चुनौती पेश कर रहा है। प्रमुख शिपिंग रूट, जैसे कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जहां से भारत का 14% निर्यात और 20-21% आयात होता है, बाधित हो सकते हैं। यदि संघर्ष लंबा चला, तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) और बढ़ सकता है। तेल के हर $10 प्रति बैरल बढ़ने पर यह 0.30-0.40% तक बढ़ सकता है। इस महंगाई से उपभोक्ता खर्च कम हो सकता है और भारत की GDP ग्रोथ के अनुमान, जो फिलहाल FY27 के लिए 7% के आसपास हैं, पर भी असर पड़ सकता है।

स्टार्टअप्स के लिए टाइट कंडीशंस

SWFs की स्थिर संपत्तियों में निवेश की प्राथमिकता और फिलहाल पूंजी बचाने की उनकी रणनीति, भारतीय स्टार्टअप्स के लिए फंड जुटाना और भी मुश्किल बना रही है। इससे उनके लिए फंड का एक अहम जरिया सीमित हो गया है और ब्लॉक डील के जरिए एग्जिट (Exit) की संभावनाएं भी कम हो गई हैं। जो कंपनियां मजबूत मुनाफा या स्थिर बिजनेस मॉडल नहीं दिखा पाएंगी, उन्हें वैल्यूएशन में बड़ी कटौती का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में, पब्लिक लिस्टिंग के बजाय मर्जर और अधिग्रहण (Mergers and Acquisitions) एक ज्यादा व्यावहारिक रास्ता बन सकता है।

आने वाले समय में आक्रामक जोखिम लेने के बजाय संयमित निवेश का माहौल रहने की उम्मीद है। भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए पूंजी तक पहुंच टाइट हो जाएगी, जिसके लिए सावधानीपूर्वक विकास योजनाओं और सख्त वित्तीय अनुशासन की आवश्यकता होगी। निवेशक स्पष्ट मुनाफा, मजबूत गवर्नेंस (Governance) और टिकाऊ बिजनेस इकोनॉमिक्स वाली स्टार्टअप्स को प्राथमिकता देंगे। मध्य पूर्व के SWFs की रणनीति में बदलाव भारत के टेक फंडरेज़िंग (Fundraising) के लिए एक धीमी अवधि का संकेत दे रहा है, जहां पूंजी जुटाने वाली कंपनियों के लिए पारंपरिक IPO रूट की बजाय M&A के अवसर ज्यादा देखे जा सकते हैं।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.