बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप Loopworm अब पशु आहार (animal feed) से आगे बढ़कर फार्मास्युटिकल मार्केट में कदम रख रहा है। कंपनी रेशम के कीड़ों (silkworm) से जुड़े कचरे का उपयोग करके डायग्नोस्टिक रिएजेंट्स और एंजाइम्स बनाएगी।
बेंगलुरु का स्टार्टअप Loopworm अब अपने बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव कर रहा है। कंपनी रेशम के कोकून (cocoon) से निकलने वाले बाय-प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करके प्रोटीन एक्सट्रैक्ट करती है। अब यही टेक्नोलॉजी उन्हें फार्मा और डायग्नोस्टिक सेक्टर में हाई-मार्जिन अवसर दिला सकती है।
क्या है इनकी खास टेक्नोलॉजी?
कंपनी के पास LoopBac नाम का एक प्लेटफॉर्म है, जो रेशम के प्यूपा (silkworm pupae) का इस्तेमाल बायोलॉजिकल होस्ट के तौर पर करता है। इससे जटिल प्रोटीन्स तैयार किए जाते हैं, जो पारंपरिक 'मैमेलियन सेल कल्चर' (mammalian cell culture) की तुलना में कहीं ज्यादा सस्ते होते हैं। अभी तक भारतीय लैब्स को इन जरूरी चीजों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसे Loopworm खत्म करना चाहती है।
मुनाफे में है कंपनी
खास बात यह है कि सीरीज A फंडिंग से पहले ही कंपनी मुनाफे में चल रही है। इनकी 6,000 मीट्रिक टन सालाना क्षमता वाली यूनिट, 'LoopFactory' बेंगलुरु में स्थित है, जिसे 'LoopLab' का तकनीकी सपोर्ट मिलता है। कंपनी ने पहले ही जेलीफ़िश में पाए जाने वाले जटिल प्रोटीन्स बनाकर अपनी टेक्नोलॉजी को साबित कर दिया है।
भविष्य की योजनाएं
फिलहाल कंपनी डायग्नोस्टिक्स मार्केट पर ध्यान दे रही है, क्योंकि यहाँ नियम थोड़े सरल हैं। इसके बाद वे काइनेज (kinases) और अंततः वैक्सीन एंटीजन (vaccine antigen) मार्केट में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि क्या कंपनी फार्मा ग्रेड के कड़े मानकों (quality standards) पर खरा उतरते हुए प्रोडक्शन को स्केल कर पाती है या नहीं।
