Flipkart और PhonePe जैसी दिग्गज कंपनियां अपना हेडक्वार्टर विदेश से वापस भारत शिफ्ट कर रही हैं। इस 'Reverse Flipping' के पीछे का बड़ा मकसद घरेलू बाजार में IPO लाना है, लेकिन निवेशकों के लिए इसके साथ जुड़े टैक्स और कानूनी जोखिमों को समझना बेहद जरूरी है।
बीते सालों में भारतीय स्टार्टअप्स का चलन था कि वे सिंगापुर, अमेरिका या केमैन आइलैंड्स में अपनी होल्डिंग कंपनी बनाते थे। ऐसा ग्लोबल कैपिटल जुटाने और टैक्स नियमों से बचने के लिए किया जाता था। लेकिन अब हवा बदल चुकी है। Flipkart, PhonePe, Groww और Zepto जैसी बड़ी कंपनियां अब 'Reverse Flipping' कर रही हैं, यानी वे अपना लीगल ठिकाना वापस भारत ला रही हैं।
क्यों हो रही है यह 'घर वापसी'?
यह ट्रेंड बताता है कि अब स्टार्टअप्स का नजरिया बदल रहा है। इन कंपनियों का बड़ा बिजनेस भारत में है, इसलिए वे अब अपनी कानूनी संरचना को भी यहीं लाना चाहती हैं। सबसे बड़ा लक्ष्य है—भारतीय स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टिंग। जब कंपनी का ढांचा भारत का होता है, तो देश में IPO लाना बहुत आसान हो जाता है। इसके अलावा, गुजरात का GIFT City भी एक बड़ा सपोर्ट सिस्टम बनकर उभरा है, जिसने नियमों को काफी आसान बना दिया है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
देखने में यह कदम सकारात्मक लग सकता है, लेकिन यह कोई आसान रास्ता नहीं है। निवेशकों को इसके दो बड़े जोखिम समझने चाहिए:
टैक्स का भारी बोझ: जब कंपनी अपना ठिकाना बदलती है, तो शेयरधारकों को अपने विदेशी शेयर बदलकर घरेलू शेयर लेने पड़ते हैं। यह प्रक्रिया 'Capital Gains Tax' को ट्रिगर कर सकती है, जिससे फाउंडर्स और शुरुआती निवेशकों पर भारी कैश आउटफ्लो का दबाव पड़ता है।
कानूनी और ऑपरेशनल जटिलताएं: अपनी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) को शिफ्ट करना, एम्प्लॉई स्टॉक ऑप्शन प्लान (ESOP) में बदलाव करना और भारतीय कानूनों के मुताबिक कॉर्पोरेट गवर्नेंस को ढालना—यह सब बेहद खर्चीला और वक्त लेने वाला काम है। इसमें मैनेजमेंट का ध्यान भटकने और शॉर्ट-टर्म फाइनेंशियल फ्लेक्सिबिलिटी पर असर पड़ने का रिस्क भी रहता है।
निष्कर्ष यह है कि अगर ये कंपनियां इन बाधाओं को पार कर लेती हैं, तो आने वाले सालों में हमें भारतीय मार्केट में बड़े टेक IPOs की बाढ़ देखने को मिल सकती है। निवेशकों को नजर रखनी चाहिए कि ये कंपनियां अपने टैक्स और लिस्टिंग की राह को कैसे मैनेज करती हैं।
