इकोसिस्टम में आया अहम मोड़
भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम, जो तेज़ी से बढ़ा और जिसमें Unicorns की संख्या भी काफ़ी बढ़ी, अब परिपक्वता (maturation) के एक अहम दौर में पहुँच गया है। अब सिर्फ़ इनोवेशन और बड़े पैमाने पर पहुंचने की कहानी नहीं है, बल्कि फोकस टिकाऊ Profitability, नैतिक व्यावसायिक आचरण (ethical business conduct) और हाई-इम्पैक्ट टेक्नोलॉजी में रणनीतिक निवेश पर है। निवेशकों की सोच में बदलाव और मज़बूत फंडामेंटल्स पर ज़ोर, आक्रामक ग्रोथ से हटकर स्थायी वैल्यू बनाने की ओर इशारा कर रहा है।
फंडिंग की नई रणनीति
ऊपर से देखने पर भले ही फंडिंग धीमी लगे, लेकिन असल में भारत में वेंचर कैपिटल (VC) फंडिंग का तरीका बदल रहा है। 2025 की पहली छमाही में, बड़े डील्स की संख्या कम होने और मैक्रोइकॉनॉमिक अनिश्चितताओं के कारण VC फंडिंग में 11% की गिरावट आकर $5.7 बिलियन पर आ गई। वहीं, कुल VC और PE फंड डिप्लॉयमेंट 2025 में 39% बढ़कर $12.1 बिलियन हो गया। इससे पता चलता है कि निवेशक अब गवर्नेंस, मेज़रेबल इंपैक्ट और साफ़ Profitability वाले रास्ते पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। जो कंपनियां पहले 'growth-at-all-costs' मॉडल पर चलती थीं, उन्हें अब सस्टेनेबल रेवेन्यू और कॉस्ट एफिशिएंसी साबित करनी होगी। अर्ली-स्टेज फंडिंग अभी भी मज़बूत है, खासकर कॉर्पोरेट इनोवेशन आर्म्स और माइक्रो-VCs से, जबकि बड़े फंड ज़्यादा सोच-समझकर निवेश कर रहे हैं।
डीप टेक का बढ़ता दबदबा
India's startup ecosystem, जो Unicorns की संख्या (2026 की शुरुआत तक लगभग 125) और स्केल (दिसंबर 2025 तक 2.07 लाख से ज़्यादा रेकग्नाइज्ड स्टार्टअप्स) के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है, अब एक बदलती हुई कॉम्पिटिटिव दुनिया का सामना कर रहा है। 2025 के स्टार्टअप इकोसिस्टम इंडेक्स में भारत 22वें स्थान पर है, जो पिछले सालों से थोड़ी गिरावट है। जहां चीन 64 ज़रूरी टेक्नोलॉजी में से 57 में आगे है, वहीं भारत 45 में आगे है, और बायोलॉजिकल मैन्युफैक्चरिंग और डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर्स जैसे क्षेत्रों में अमेरिका से भी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। फोकस अब कंज्यूमर-सेंट्रिक एप्लिकेशन्स से हटकर डीप टेक, AI, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, क्लाइमेट टेक और हेल्थकेयर जैसे स्ट्रेटेजिक सेक्टर की ओर बढ़ रहा है। NASSCOM की रिपोर्ट्स के मुताबिक, मज़बूत बिज़नेस फंडामेंटल्स के चलते टेक स्टार्टअप्स के रेवेन्यू और Profitability में बड़ी बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, 50% से ज़्यादा नए स्टार्टअप्स टियर-2 और टियर-3 शहरों से आ रहे हैं, जो इंटरप्रेन्योरशिप के लोकतंत्रीकरण (democratization) का संकेत है।
चुनौतियां भी कम नहीं
इस तरक्की के बावजूद, बड़ी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। कई भारतीय Unicorns को Profitability के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी है, और 2024 से पहले के फाइनेंशियल इयर्स में बड़े ऑपरेटिंग लॉसेस दर्ज किए गए थे। इकोसिस्टम में 'ब्रेन ड्रेन' एक समस्या बनी हुई है, जहां टॉप टैलेंट ज़्यादातर ज़्यादा सैलरी वाली नौकरियों और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की तलाश में विदेश चला जाता है। रेगुलेटरी कॉम्प्लेक्सिटीज़, हालांकि सुलझाई जा रही हैं, फिर भी एक बाधा बन सकती हैं। हाई वैल्यूएशन से लगातार Profitability की ओर बढ़ना एक अहम परीक्षा है। चीन जहां स्ट्रेटेजिक टेक्नोलॉजी में आगे है, वहीं भारत का फोकस ऐतिहासिक रूप से सॉफ्टवेयर और एंटरप्राइज टेक्नोलॉजी पर रहा है, कैपिटल-इंटेंसिव हार्डवेयर या ग्लोबली कॉम्पिटिटिव AI मॉडल्स पर कम। एथिकल कंसीडरेशन्स भी बहुत ज़रूरी हैं; पारदर्शिता, पर्यावरण की ज़िम्मेदारी और सामाजिक जवाबदेही पर ज़ोर, 'ग्रीनवॉशिंग' से बचने और कंज्यूमर का भरोसा बनाए रखने के लिए असली प्रतिबद्धता की मांग करता है।
भविष्य की राह: धैर्यवान पूंजी (Patient Capital) और वैश्विक व्यापार
₹10,000 करोड़ के कॉर्पस के साथ अप्रूव हुआ 'Startup India Fund of Funds 2.0' (FoF 2.0) एक रणनीतिक बदलाव का प्रतीक है। इस पहल का मकसद लॉन्ग-टर्म वेंचर कैपिटल को अनलॉक करना, कैपिटल-इंटेंसिव डीप टेक सेक्टर को सपोर्ट करना और बड़े शहरों के बाहर इनोवेशन को बढ़ावा देना है। सरकार का लक्ष्य है कि शुरुआती वित्तीय मदद की कमी के कारण अच्छे आइडियाज़ फेल न हों, जिससे अर्ली-स्टेज फेलियर कम हों और ग्लोबली कॉम्पिटिटिव प्रोडक्ट्स तैयार हों। ट्रेड डायनामिक्स भी एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं, जिसमें SaaS, डिजिटल सर्विसेज और मैन्युफैक्चरिंग जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड स्टार्टअप्स विदेशी मुद्रा आय और आर्थिक मजबूती को बढ़ावा देंगे। यह लॉन्ग-टर्म विज़न भारत के 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य के साथ जुड़ा है, जहां स्टार्टअप्स को सिर्फ़ इंटरप्रेन्योरशिप प्रमोशन से आगे बढ़कर राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा (national competitiveness) के इंजन के तौर पर देखा जाएगा।