Neosapien के CEO धनंजय यादव ने भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में फंडिंग के भेदभाव पर बड़ी बहस छेड़ दी है। निवेशक 'क्विक एग्जिट' के चक्कर में कंज्यूमर-सेंट्रिक ऐप्स को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे लंबे समय तक चलने वाले Deeptech और R&D प्रोजेक्ट्स को नजरअंदाज किया जा रहा है।
फंडिंग का 'शॉर्ट टर्म' खेल
हाल ही में Neosapien के CEO धनंजय यादव की टिप्पणियों ने भारतीय वेंचर कैपिटल (VC) जगत की एक कड़वी सच्चाई सामने रख दी है। जहाँ कंज्यूमर स्टार्टअप्स भारी भरकम खर्च करके तेजी से यूजर बेस बढ़ाने का वादा करते हैं, वहीं Deeptech कंपनियां—जो AI, रोबोटिक्स और एडवांस इंजीनियरिंग पर काम करती हैं—उन्हें अपनी कॉमर्शियल सफलता के लिए सालों के रिसर्च और धैर्य की जरूरत होती है।
क्यों पीछे है Deeptech?
ज्यादातर निवेशक 5 से 7 साल की टाइमलाइन में एग्जिट (Exit) चाहते हैं। यह मॉडल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए तो फिट बैठता है, लेकिन हाई-टेक इनोवेशन के लिए 10 साल तक का समय लग सकता है। यह उम्मीदों का मिसमैच (Mismatch) Deeptech के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा है।
लॉन्ग-टर्म आर्थिक नुकसान
आज स्थिति यह है कि कंपनियां मार्केट शेयर हथियाने के लिए कैश बर्न कर रही हैं, जबकि Deeptech कंपनियों के फंडामेंटल्स मजबूत होने के बावजूद उन्हें पर्याप्त सपोर्ट नहीं मिल पा रहा है। अगर भारत सिर्फ ऐप्स बनाने तक सीमित रहा, तो भविष्य में हम ग्लोबल टेक्नोलॉजी के मामले में आत्मनिर्भर होने के बजाय विदेशी आयात पर ही निर्भर रहेंगे।
आगे की राह: क्या बदलेंगे हालात?
जानकारों का मानना है कि अब समय आ गया है कि देश के बड़े बिजनेस हाउसेस और कॉरपोरेट वेंचर आर्म्स इसमें कदम रखें। ये संस्थाएं 'पेशेंट कैपिटल' (Patient Capital) यानी बिना किसी जल्दबाजी के लंबे समय के निवेश को बढ़ावा दे सकती हैं। आने वाले समय में सरकारी नीतियां और डेडिकेटेड Deeptech फंड्स ही तय करेंगे कि भारत केवल 'कंज्यूमर मार्केट' बनकर रहेगा या 'टेक्नोलॉजी हब' के रूप में उभरेगा।
