भारत की स्पेस महत्वाकांक्षाओं में प्राइवेट सेक्टर का उदय
यह ज़बरदस्त ग्रोथ बताती है कि भारत की स्पेस महत्वाकांक्षाओं में एक बड़ा बदलाव आया है। अब यह सिर्फ़ सरकारी दम पर चलने वाला मॉडल नहीं रहा, बल्कि प्राइवेट कंपनियों की तरफ से लीड किया जा रहा है। इतनी सारी नई कंपनियां और भारी इनवेस्टमेंट देखकर लग रहा है कि यह सेक्टर तेज़ी से बढ़ेगा, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह रफ़्तार टिकेगी और क्या हम दुनिया भर की स्पेस कंपनियों को टक्कर दे पाएंगे?
रॉकेट्री की रफ़्तार: प्राइवेट स्पेस का कमाल
भारत का प्राइवेट स्पेस सेक्टर पॉलिसी रिफॉर्म्स और बिज़नेस के बढ़ते जोश की वजह से गज़ब की रफ़्तार से बढ़ रहा है। 2026 की शुरुआत तक 400 से ज़्यादा स्पेस स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं, जिन्होंने कुल मिलाकर $500 मिलियन (करीब ₹4,000 करोड़) से ज़्यादा का इनवेस्टमेंट आकर्षित किया है। इस तेज़ी के चलते प्राइवेट कंपनियों ने सब-ऑर्बिटल लेवल पर लॉन्च व्हीकल्स का सफलतापूर्वक टेस्ट किया है। नवंबर 2022 में Skyroot Aerospace और मई 2024 में Agnikul Cosmos ने इस दिशा में अहम मील के पत्थर हासिल किए। इसके अलावा, PSLV ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (POEM) प्लेटफॉर्म ने 25 प्राइवेट पेलोड्स को असली स्पेस कंडीशंस में टेस्ट करने का मौका दिया है, और 6 नॉन-गवर्नमेंटल एंटिटीज़ (NGEs) 18 सैटेलाइट्स को ऑर्बिट में लॉन्च कर चुकी हैं। सरकार भी इस ग्रोथ को पंख लगा रही है। 2024 में ₹1,000 करोड़ का स्पेस वेंचर कैपिटल फंड बनाया गया है, जिसका मकसद शुरुआती दौर के स्पेस स्टार्टअप्स को फंड देना है। स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) की टेक्नोलॉजी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को ट्रांसफर करने का लक्ष्य भी लॉन्च की संख्या बढ़ाना और कमर्शियलाइज़ेशन को तेज़ करना है। राज्य सरकारें भी इस सेक्टर को 'सनराइज सेक्टर' घोषित कर रही हैं और स्पेशल इंसेंटिव स्कीम्स ला रही हैं।
ग्लोबल मंच पर भारत: कहां खड़े हैं हम?
भारत की प्राइवेट स्पेस इकोनॉमी का अनुमानित मूल्य करीब $8.4 बिलियन है, जो ग्लोबल मार्केट का लगभग 2% है। वहीं, ग्लोबल स्पेस मार्केट के 2033 तक $44 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है। दुनिया भर में, 2030 तक स्पेस में प्राइवेट इनवेस्टमेंट $1 ट्रिलियन से ज़्यादा होने की उम्मीद है, जिसमें 2020 से 2023 के बीच वेंचर कैपिटल (VC) का हिस्सा $50 बिलियन से ज़्यादा रहा है। हालाँकि भारत में स्टार्टअप्स की संख्या अच्छी है, पर हम अमेरिका से पीछे हैं, जहाँ 825 से ज़्यादा ऐसी कंपनियां हैं। ग्लोबल ट्रेंड्स बताते हैं कि लॉन्च कॉस्ट में भारी कमी आ रही है और सैटेलाइट इंटरनेट और डेटा सर्विसेज की डिमांड बढ़ रही है। SSLV टेक्नोलॉजी को HAL को ट्रांसफर करने का भारत का कदम स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च मार्केट का बड़ा हिस्सा कैप्चर करने का इरादा दिखाता है, जिसके बढ़ने की उम्मीद है। गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे कई राज्य इनवेस्टमेंट को लुभाने के लिए खास पॉलिसीज़ और इंसेंटिव्स ला रहे हैं।
बड़ी चुनौतियां: 'मेड इन इंडिया' स्पेस को ग्लोबल बनाना
इस ज़बरदस्त ग्रोथ के बावजूद, कई बड़ी चुनौतियां भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर की सस्टेनेबिलिटी (स्थिरता) और ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस को खतरे में डाल सकती हैं। सबसे बड़ी रुकावट सब-ऑर्बिटल टेस्ट्स से आगे बढ़कर लगातार, भरोसेमंद और किफायती ऑर्बिटल लॉन्च क्षमताएं विकसित करना है। Skyroot Aerospace जैसी कंपनियों ने $99.8 मिलियन और Agnikul Cosmos ने $61.5 मिलियन का इनवेस्टमेंट जुटाया है, लेकिन इन प्राइवेट कंपनियों का ऑर्बिटल लॉन्च का ऑपरेशनल ट्रैक रिकॉर्ड अभी बहुत नया है। कुल $500 मिलियन से ज़्यादा का इनवेस्टमेंट भारत के लिए बड़ा है, लेकिन ग्लोबल प्राइवेट स्पेस इनवेस्टमेंट के मुकाबले यह बहुत कम है। अकेले अमेरिका ने 2025 में दुनिया भर की फंडिंग का 52% कैप्चर किया। भारत के स्पेस सेक्टर का $8.4 बिलियन का वैल्यूएशन ग्लोबल मार्केट का सिर्फ़ 2% है, जो बताता है कि स्थापित खिलाड़ियों को टक्कर देने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। फंडिंग बढ़ तो रही है, लेकिन इसमें हालिया उतार-चढ़ाव देखे गए हैं। 2024 में भारत में स्पेस टेक फंडिंग पिछले साल के मुकाबले 53% से ज़्यादा गिरी है, और लेट-स्टेज फंडिंग की कमी एक चिंता का विषय बनी हुई है। एयरोस्पेस इंडस्ट्री की हाई कैपिटल इंटेंसिटी (पूंजी की गहनता) और लंबे डेवलपमेंट साइकल्स का मतलब है कि ऑपरेशन्स को स्केल अप करने और प्रॉफिटेबिलिटी (लाभप्रदता) हासिल करने के लिए मौजूदा स्तरों से कहीं ज़्यादा और लगातार कैपिटल की ज़रूरत होगी। सरकारी सपोर्ट एक बड़ा बूस्ट दे रहा है, लेकिन अगर पॉलिसी की प्राथमिकताएं बदलीं या फंड की कमी हुई तो यह एक रिस्क बन सकता है।
भविष्य का नज़रिया: अंतरिक्ष में भारत की नई उड़ान
अनुमान है कि भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक $44 बिलियन तक पहुँच सकती है, जिससे हम ग्लोबल शेयर का करीब 8-10% कैप्चर कर पाएंगे। इस ग्रोथ में लॉन्च सर्विसेज, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, अर्थ ऑब्जर्वेशन और नेविगेशन में तरक्की के साथ-साथ एक मैच्योर प्राइवेट इकोसिस्टम का योगदान होगा। एनालिस्ट्स का मानना है कि लगातार पॉलिसी सपोर्ट और टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन से यह मोमेंटम बना रहेगा। सरकार की महत्वाकांक्षा 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksha Station) और 2040 तक मानव मिशन लॉन्च करने की है, जो इस सेक्टर के लिए एक लंबी अवधि का स्ट्रेटेजिक विज़न दिखाता है। ग्लोबल एयरोस्पेस सप्लाई चेन्स में भारत का बढ़ता इंटीग्रेशन भी आउटलुक को मज़बूत करता है, जिससे यह देश इंटरनेशनल स्पेस एरीना में एक अहम प्लेयर बन सकता है।
