भारत के डीप-टेक स्टार्टअप्स ने इस साल अब तक **61** डील के जरिए **$574 मिलियन** का निवेश जुटा लिया है। यह तेजी पारंपरिक वेंचर कैपिटल कंपनियों के लिए एक चुनौती है, जो अब सॉफ्टवेयर मॉडल से हटकर तकनीकी बारीकियों पर ध्यान दे रही हैं।
डीप-टेक में निवेश का नया रिकॉर्ड
भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप इकोसिस्टम ने 2026 में एक नया मुकाम हासिल किया है। इस साल अब तक 61 सौदों के जरिए $574 मिलियन का फंड जुटाया गया है, जिसके साथ साल 2015 से अब तक कुल निवेश का आंकड़ा करीब $11.4 बिलियन तक पहुंच गया है।
क्यों बदल रहे हैं निवेश के नियम?
पहले के इन्वेस्टर्स मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस (SaaS) और ई-कॉमर्स पर निर्भर थे, जहां रिवेन्यू ग्रोथ देखना आसान था। लेकिन स्पेस, क्वांटम कंप्यूटिंग और बायोटेक जैसे क्षेत्रों में, जहां कमर्शियल रिवेन्यू आने में लंबा समय लगता है, वहां पुराने तरीके काम नहीं आ रहे हैं। इस जोखिम को कम करने के लिए अब वीसी (VC) फर्म्स फाइनेंशियल एनालिस्ट के बजाय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को हायर कर रही हैं ताकि कंपनी की टेक्नोलॉजी का सही मूल्यांकन किया जा सके।
प्रमुख खिलाड़ी और सरकारी मदद
Antler, Bertelsmann India Investments और Jungle Ventures जैसी दिग्गज कंपनियां अब अपनी टीमों में तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल कर रही हैं। वहीं, सरकार की ₹1 लाख करोड़ की 'रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन स्कीम' स्टार्टअप्स के लिए एक बड़े सुरक्षा कवच के रूप में काम कर रही है। हालांकि, 'वैली ऑफ डेथ' (सीरीज बी और सी स्टेज) का चैलेंज अभी भी बरकरार है, जहां स्टार्टअप्स को बड़े पैमाने पर कमर्शियल प्रोडक्शन के लिए फंड की कमी का सामना करना पड़ता है।
सफलता की कहानियां
सफलता का उदाहरण सामने है—Pixxel ने सैटेलाइट इमेजिंग टेक्नोलॉजी के लिए $100 मिलियन जुटाए हैं, जबकि स्पेस-टेक कंपनी Skyroot ने $60 मिलियन की फंडिंग हासिल की है। भविष्य में डीप-टेक सेक्टर की ग्रोथ इस बात पर निर्भर करेगी कि निवेशक वैज्ञानिक प्रूफ को मास-मार्केट रियलिटी में बदलने के लिए कितना 'पेशेंट कैपिटल' (Patient Capital) उपलब्ध कराते हैं।
