Flipkart और Swiggy जैसी बड़ी कंपनियों के पूर्व कर्मचारी अब खुद का स्टार्टअप लॉन्च कर रहे हैं। इन 'ऑपरेटर-फाउंडर्स' के पास काम का तगड़ा अनुभव है, जिसके चलते वेंचर कैपिटल (VC) फर्में अब बिना सोचे-समझे विस्तार के बजाय अनुशासित विकास (disciplined growth) को प्राथमिकता दे रही हैं।
भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यूनिकॉर्न कंपनियों से निकले अनुभवी प्रोफेशनल्स अब खुद फाउंडर बनकर मैदान में उतर रहे हैं। इन्हें 'ऑपरेटर-फाउंडर्स' कहा जा रहा है और ये उन कंपनियों से आए हैं जिन्होंने Flipkart, Swiggy, Zomato और InMobi जैसे प्लेटफॉर्म्स को स्केल करने में अहम भूमिका निभाई है।\n\n### निवेशकों का क्यों बढ़ रहा है भरोसा?\nनिवेशकों के लिए यह ट्रेंड एक बड़े जोखिम को कम करने जैसा है। ये फाउंडर्स 'ग्रोथ-एट-ऑल-कॉस्ट' के बजाय यूनिट इकोनॉमिक्स और सस्टेनेबल ग्रोथ पर फोकस कर रहे हैं। इनके पास पहले से ही बड़ी कंपनियों में काम करने का तजुर्बा है, जिससे इन्हें पता है कि बिजनेस को लंबे समय तक कैसे चलाना है।\n\n### इकोसिस्टम और AI का असर\nस्टॉक ऑप्शंस (ESOPs) से मिली नकदी और बेहतरीन प्रोफेशनल नेटवर्क्स ने इन नए फाउंडर्स के लिए राह आसान कर दी है। 'Flipkart Mafia' का उदाहरण इस बदलाव का सबसे बड़ा ब्लू प्रिंट है। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल करके ये टीमें कम स्टाफ के साथ भी ऑपरेशनल एफिशिएंसी बनाए रखने में कामयाब हो रही हैं, जिससे कंपनी का 'बर्न रेट' (burn rate) काफी कम हो गया है।\n\n### क्या अभी भी है खतरा?\nबेशक अनुभव का बड़ा महत्व है, लेकिन बाजार के जानकार अभी भी सतर्क हैं। बड़ी कंपनियों का ब्रांड नेम और स्ट्रक्चर्ड इंफ्रास्ट्रक्चर मिलना एक अलग बात है और शून्य से स्टार्टअप खड़ा करना बिल्कुल अलग चुनौती। कॉम्पिटिशन और रेगुलेटरी बदलाव के बीच, निवेशकों की नजर इस बात पर है कि कौन सा फाउंडर अपनी इस पुरानी सीख को असली इनोवेशन में बदल पाता है। दिन के अंत में, अब वही स्टार्टअप्स टिकेंगे जो वैल्युएशन से ज्यादा अपनी प्रॉफिटेबिलिटी की राह साफ दिखा पाएंगे।
