साल 2026 में भारतीय मैन्युफैक्चरिंग स्टार्टअप्स के लिए निवेश की झड़ी लगी है। अब तक इन कंपनियों को **$635 मिलियन** की फंडिंग मिल चुकी है, जो 2020 के मुकाबले **4 गुना** ज्यादा है। निवेशक अब सॉफ्टवेयर की जगह डीप-टेक और मेडिकल डिवाइसेस जैसे हार्डवेयर सेक्टर पर बड़ा दांव लगा रहे हैं।
भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। साल 2020 में जहां ये स्टार्टअप सिर्फ $118 मिलियन जुटा पाए थे, वहीं 2026 में यह आंकड़ा $635 मिलियन तक पहुंच गया है। अब वेंचर कैपिटलिस्ट का रुझान डिजिटल-फर्स्ट मॉडल्स से हटकर हार्डवेयर-केंद्रित व्यवसायों की ओर बढ़ गया है, खासकर डीप-टेक, मेडिकल डिवाइसेस और इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन जैसे क्षेत्रों में।
सॉफ्टवेयर से हार्डवेयर की ओर क्यों शिफ्ट हुए निवेशक?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आने के बाद सॉफ्टवेयर कोड तैयार करना आसान हो गया है, यही वजह है कि निवेशक अब उन कंपनियों को पसंद कर रहे हैं जिनके पास खुद की फिजिकल एसेट्स और प्रोप्राइटरी प्रोडक्शन तकनीक है। पुराने दौर के विपरीत, अब निवेशक सिर्फ मार्केट सेंटीमेंट पर पैसा नहीं लगा रहे, बल्कि वे पहले वर्किंग प्रोडक्ट, कस्टमर वैलिडेशन और भविष्य के ऑर्डर की गारंटी देख रहे हैं।
'मिडल स्टेज' फंडिंग की चुनौती
फंडिंग बढ़ तो रही है, लेकिन एक बड़ी बाधा 'पायलट प्रोजेक्ट' से 'कमर्शियल प्रोडक्शन' तक का सफर है। इस स्टेज पर भारी निवेश की जरूरत होती है, और अक्सर स्टार्टअप्स के पास इतना ट्रैक रिकॉर्ड नहीं होता कि उन्हें आसानी से बैंक लोन मिल सके। इसके लिए कंपनियां अब वेंचर डेट और इक्विपमेंट फाइनेंसिंग का सहारा ले रही हैं। साथ ही, सरकार की PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) जैसी योजनाएं भी इस सेक्टर को मजबूत बना रही हैं।
हालांकि, निवेशकों को सावधानी बरतने की जरूरत है। मैन्युफैक्चरिंग एक कैपिटल-इंटेंसिव सेक्टर है जिसमें प्रॉफिटेबिलिटी आने में लंबा समय लगता है। जो स्टार्टअप अपनी वर्किंग कैपिटल को सही ढंग से मैनेज नहीं कर पाएंगे या जिनके प्रोजेक्ट्स में देरी होगी, उनके मार्जिन पर दबाव दिख सकता है। आने वाले समय में निवेशकों के लिए स्टार्टअप की यूनिट इकोनॉमिक्स और प्रोडक्शन कैपेसिटी का सही इस्तेमाल सबसे महत्वपूर्ण मॉनिटरेबल होगा।
