साल 2026 में भारतीय सेमीकंडक्टर (Semiconductor) और स्पेस (Space) स्टार्टअप्स में वेंचर कैपिटल (Venture Capital) फंडिंग ने रफ्तार पकड़ ली है। जनवरी से जुलाई 2026 के बीच इन कंपनियों में कुल **$171.6 मिलियन** का निवेश हुआ है। सरकारी को-इन्वेस्टमेंट (Co-investment) नीतियों और बढ़ते प्राइवेट सेक्टर के इंटरेस्ट के चलते हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग (High-tech Manufacturing) में निवेशकों की दिलचस्पी साफ दिख रही है।
Detailed Coverage
सरकारी नीति का बड़ा दांव
इस निवेश के पीछे सरकार की 'सेमीकॉन 2.0' (Semicon 2.0) पॉलिसी का बड़ा हाथ है। इस पॉलिसी के तहत, सरकारें वेंचर कैपिटल फर्म्स (Venture Capital Firms) के साथ मिलकर सेमीकंडक्टर डिजाइन स्टार्टअप्स में पैसा लगा रही हैं। खास बात ये है कि वे मैनेजमेंट में दखल नहीं देंगी, जिससे प्राइवेट निवेशकों का रिस्क कम होगा। हार्डवेयर डेवलपमेंट (Hardware Development) में लगने वाली भारी लागत और लंबे समय के चलते निवेशक पहले हिचकिचाते थे, लेकिन अब सरकार की इस पहल से डोमेस्टिक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन (Domestic Semiconductor Supply Chain) को मजबूती मिलेगी।
सेक्टर का वैल्यूएशन और फंडिंग का हाल
स्पेस सेक्टर में Skyroot Aerospace जैसी कंपनियां $1.1 बिलियन के वैल्यूएशन तक पहुंच गई हैं, वहीं Digantara जैसी सैटेलाइट फर्म $200 मिलियन का वैल्यूएशन पार कर चुकी है। चिप डिजाइन स्पेस में Lemurian Labs ने $28 मिलियन की सीरीज़ A फंडिंग हासिल की है, और टॉप कंपनियों का वैल्यूएशन $75 मिलियन से $120 मिलियन के बीच है।
हालांकि, निवेशक अभी भी सावधानी बरत रहे हैं। वे उन कंपनियों पर फोकस कर रहे हैं जो प्रोडक्ट डेवलपमेंट (Product Development) में ठोस प्रोग्रेस दिखा सकें। सेमीकंडक्टर और एयरोस्पेस प्रोजेक्ट्स में टेक्निकल देरी का रिस्क हमेशा रहता है, जिससे कैश फ्लो (Cash Flow) पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, ग्लोबल सप्लाई चेन (Global Supply Chain) पर निर्भरता भी एक बड़ा फैक्टर है। इन स्टार्टअप्स की असली परीक्षा यह होगी कि वे प्रोडक्शन माइलस्टोन्स (Production Milestones) को कैसे पूरा करते हैं और लंबे समय के लिए कमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट्स (Commercial Contracts) कैसे हासिल करते हैं।
