साल 2022 से भारतीय सेमीकंडक्टर स्टार्टअप्स ने **$206 मिलियन** जुटाए हैं। निवेशकों का रुख अब शुरुआती आइडियाज से हटकर, तैयार प्रोडक्ट्स वाली कंपनियों की ओर बढ़ रहा है। फंडिंग डील्स की संख्या भले ही घटी हो, लेकिन हर डील में निवेश की रकम बढ़ रही है।
फंडिंग का बदला मिजाज
'इंडियन सेमीकंडक्टर स्टार्टअप लैंडस्केप 2026' रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 से अब तक भारतीय सेमीकंडक्टर स्टार्टअप्स ने कुल $206 मिलियन की फंडिंग जुटाई है। यह पैसा 51 फंडिंग डील्स के जरिए आया है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वेंचर कैपिटल (Venture Capital) का फ्लो अब बदल गया है। पहले जहां निवेशक कई शुरुआती आइडियाज में छोटी-छोटी रकम लगाते थे, वहीं अब वे उन कंपनियों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो अपने प्रोडक्ट्स को कमर्शियलाइज (Commercialize) करने के करीब हैं।
कम डील्स, ज्यादा पैसा
डेटा यह साफ दिखाता है कि अब निवेशक क्वालिटी और मैच्योरिटी को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। 2024 में जहां 16 फंडिंग डील्स हुईं, वहीं 2026 की पहली छमाही में यह संख्या घटकर केवल 7 रह गई। इसके बावजूद, कुल निवेश काफी ज्यादा है। 2026 के पहले हाफ में ही $61.9 मिलियन का निवेश हुआ। इससे पता चलता है कि निवेशक अब पैसे लगाने से पहले प्रोडक्ट की तैयारी या टेक्नोलॉजी के स्थापित होने का सबूत मांग रहे हैं, न कि सिर्फ शुरुआती रिस्क ले रहे हैं।
सरकारी स्कीमों का सहारा
सरकारी पहलें इन स्टार्टअप्स के लिए प्राइवेट निवेशकों का भरोसा जीतने में अहम भूमिका निभा रही हैं। खासकर 'डिजाइन-लिंक्ड इंसेंटिव (DLI)' प्रोग्राम, जो कंपनियों को सरकारी फंडिंग दिलाने में मददगार साबित हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, DLI स्कीम के तहत सपोर्ट किए गए 24 में से 14 चिप-डिजाइन प्रोजेक्ट्स ने सफलतापूर्वक वेंचर कैपिटल जुटाया है।
C2i Semiconductors, NetraSemi, Morphing Machines और Mindgrove Technologies जैसी कंपनियों ने DLI-सपोर्टेड कंपनियों द्वारा जुटाई गई कुल प्राइवेट कैपिटल का लगभग 56% हिस्सा हासिल किया है। इसके अलावा, Zoho और TDK Ventures जैसे स्ट्रैटेजिक निवेशकों (Strategic Investors) का आना इन स्टार्टअप्स को सिर्फ पैसा ही नहीं, बल्कि डिजाइन नेटवर्क, मैन्युफैक्चरिंग टूल्स और संभावित ग्राहकों तक पहुंच भी दे रहा है।
निवेशकों के लिए जोखिम
यह जानना महत्वपूर्ण है कि यहां बताई गई सेमीकंडक्टर वेंचर्स प्राइवेट, अनलिस्टेड कंपनियां हैं, जो NSE या BSE पर ट्रेड नहीं होतीं। इस सेक्टर में निवेश का मुख्य जोखिम एग्जीक्यूशन रिस्क (Execution Risk) है। एक डिजाइन प्रोटोटाइप से बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चर होने वाले प्रोडक्ट तक का सफर काफी जटिल और महंगा होता है।
इन स्टार्टअप्स को सप्लाई चेन मैनेजमेंट, फैब्रिकेशन सुविधाओं तक पहुंच और लगातार ग्राहक बनाने जैसी बड़ी चुनौतियों से निपटना होगा। साथ ही, ये निवेश पब्लिक स्टॉक्स की तुलना में काफी इलिक्विड (Illiquid) होते हैं, जिसका मतलब है कि निवेशक आसानी से अपनी पोजीशन से बाहर नहीं निकल सकते। अब देखना यह होगा कि ये कंपनियां डिजाइन माइलस्टोन से आगे बढ़कर रेवेन्यू जेनरेट करने वाले कमर्शियल प्रोडक्शन की ओर कितनी तेजी से बढ़ती हैं।
