साल 2026 के शुरुआती सात महीनों में भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में वेंचर कैपिटल फंडिंग की रफ्तार काफी सुस्त रही है। जहां वैश्विक स्तर पर इसमें **161%** का बड़ा उछाल आया है, वहीं भारत में यह आंकड़ा महज **5%** ही बढ़ा है, जो निवेशकों की सतर्कता को दर्शाता है।
भारत के वेंचर कैपिटल सेक्टर में निवेश का ट्रेंड बदल रहा है। जनवरी से जुलाई 2026 के बीच ग्लोबल मार्केट में डील वैल्यू 161% तक बढ़ गई, जबकि भारतीय स्टार्टअप्स को मिलने वाली फंडिंग में सिर्फ 5% की मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह डेटा बताता है कि अब निवेशक 'आक्रामक विस्तार' की जगह 'क्वालिटी और प्रॉफिट' पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
वैल्युएशन पर जोर और डील वॉल्यूम में गिरावट
भारतीय स्टार्टअप्स के लिए निवेशक अब काफी चुनिंदा हो गए हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि पिछले सात महीनों में कुल डील वॉल्यूम में 13% की गिरावट आई है। जानकार मानते हैं कि इससे केवल मजबूत बिजनेस मॉडल वाली कंपनियां ही टिक पाएंगी, लेकिन इसका एक नुकसान यह है कि बाजार में नई कंपनियों की संख्या घट सकती है, जिससे आने वाले समय में IPO (आईपीओ) के लिए आने वाली कंपनियों की पाइपलाइन भी छोटी हो सकती है।
ग्लोबल मार्केट की तुलना में भारत की स्थिति
दुनिया भर की फंडिंग में अमेरिका का दबदबा कायम है, जो कुल वैश्विक फंडिंग का 75% हिस्सा रखता है। वहां डील वैल्यू में 199% का बड़ा उछाल देखने को मिला है, जिसका मुख्य कारण AI और टेक्नोलॉजी प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश है। वहीं चीन ने भी रिकवरी करते हुए फंडिंग वैल्यू में 213% की बढ़त हासिल की है। इस वैश्विक दौड़ में भारत अभी भी कुल ग्लोबल वेंचर कैपिटल वैल्यू का मात्र 1% और डील वॉल्यूम का 7% ही हिस्सा है।
डीप-टेक और रेगुलेटरी चिंताएं
चिप डिजाइन और रोबोटिक्स जैसे डीप-टेक सेक्टर उम्मीद के मुताबिक फंडिंग नहीं जुटा पा रहे हैं। साल 2023 की शुरुआत से अब तक चिप डिजाइन कंपनियों को सिर्फ $162 मिलियन की फंडिंग ही मिली है। साथ ही, डिजिटल गवर्नेंस और डेटा से जुड़े कड़े नियमों ने निवेशकों के मन में अनिश्चितता बढ़ा दी है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दूसरी छमाही में स्टार्टअप्स कठिन नियमों के बीच नई पूंजी जुटा पाएंगे या फंडिंग की यह सुस्त चाल आगे भी बनी रहेगी।
