भारतीय स्टार्टअप्स में आया बड़ा बदलाव
"ग्रोथ एट ऑल कॉस्ट" (growth-at-all-costs) की दौड़ से बाहर निकलकर भारतीय स्टार्टअप्स अब टिकाऊ (sustainable) और मजबूत बिज़नेस मॉडल बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। Fortune India Startup Summit में हुई चर्चाओं के मुताबिक, इस बड़े बदलाव की नींव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को मुख्य टूल बनाने, कंज्यूमर ट्रस्ट हासिल करने, प्रभावी लोकल डिलीवरी सुनिश्चित करने और ठोस, वास्तविक नतीजे दिखाने पर टिकी है।
AI: ग्रोथ का इंजन, पर भरोसे का इम्तिहान
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब भारतीय स्टार्टअप्स के लिए एक ज़रूरत बन गया है। शहरों में AI का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ रहा है; 2025 में 56% भारतीय वयस्क जेनरेटिव AI का इस्तेमाल कर रहे थे, जो पिछले साल से काफी ज़्यादा है। हेल्थकेयर सेक्टर में तो AI का इस्तेमाल और भी मज़बूत है, जहाँ भारत ग्लोबल लेवल पर 85% पर्सनल हेल्थ टूल्स के इस्तेमाल के साथ सबसे आगे है। अनुमान है कि हेल्थकेयर AI मार्केट 2034 तक $4.77 बिलियन तक पहुँच जाएगा। Practo जैसी कंपनियां AI का इस्तेमाल करके लाखों डेटा पॉइंट्स को प्रोसेस कर रही हैं, जिससे हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स को ढूंढना आसान हो गया है।
हालांकि, इस तकनीकी क्रांति के साथ भरोसे (trust) का एक बड़ा इम्तिहान भी जुड़ा है। बहुत से भारतीय कंज्यूमर्स डिजिटल सिक्योरिटी को लेकर चिंतित हैं। 73% लोग ऑनलाइन स्कैम से डरे हुए हैं, और 67% पहचान की चोरी (identity theft) को लेकर चिंतित हैं। AI-संचालित दुनिया में विश्वास बनाने के लिए सावधानी बरतनी होगी, जिसमें ब्रांड की प्रतिष्ठा और रेगुलेशंस का पालन करना महत्वपूर्ण है।
'ट्रस्ट' और लोकल डिलीवरी बनी सबसे बड़ी ताक़त
हेल्थकेयर से लेकर एल्डर केयर और ऑर्गेनिक फूड तक, भरोसा (trust) अब कंपनियों के लिए अलग पहचान बनाने का सबसे बड़ा हथियार बन गया है। Practo के को-फाउंडर सिद्धार्थ निहलानी का कहना है कि हेल्थकेयर में भरोसा डिस्काउंट से नहीं, बल्कि लगातार अच्छे मेडिकल नतीजों से आता है। Emoha Elder Care के सौम्यजीत रॉय बताते हैं कि वे डेडिकेटेड केयर कोऑर्डिनेटर्स के ज़रिए भरोसा फिर से बना रहे हैं, जो ऐसे बाज़ार में बेहद ज़रूरी है जहाँ 99% सीनियर सिटीज़न्स घर पर ही रहकर बूढ़ा होना पसंद करते हैं।
Akshayakalpa Organic के शशि कुमार के अनुसार, कंज्यूमर्स अब प्रोडक्ट्स के सोर्स के बारे में ज़्यादा डिटेल्ड सवाल पूछ रहे हैं। इससे यह साफ है कि वादों पर खरा उतरना प्राइस कॉम्पिटिशन से ज़्यादा अहम है। हाइपरलोकल डिलीवरी मार्केट भी इसी भरोसेमंद सर्विस की मांग को दिखाता है, जहाँ क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के कारण 51.84% की शानदार CAGR देखी जा रही है, जो मिनटों में डिलीवरी का वादा करते हैं। लेकिन, इस सेक्टर में रेगुलेटरी जांच भी बढ़ रही है, खासकर गिग वर्कर्स के प्रोटेक्शन को लेकर।
फंडिंग में बदलाव: प्रॉफिट पर बढ़ता ज़ोर
टिकाऊ बिज़नेस की ओर यह बदलाव फंडिंग के माहौल में भी साफ़ दिख रहा है। फाइनेंशियल ईयर 26 (FY26) में भारत में टेक स्टार्टअप फंडिंग 18% घटकर $11.7 बिलियन रह गई। लेट-स्टेज डील्स में पिछले साल की तुलना में 38% की बड़ी गिरावट आई। यह मार्केट अब प्रॉफिटेबल बनने और सस्टेनेबल बिज़नेस मॉडल दिखाने का स्पष्ट रास्ता मांग रहा है, जो पहले के फंडिंग दौर के 'ग्रोथ एट ऑल कॉस्ट' के अप्रोच से बिल्कुल अलग है।
Akshayakalpa Organic जैसी कंपनियां, रेवेन्यू ग्रोथ के बावजूद, अभी भी नेट लॉस में चल रही हैं। Practo, जो प्री-IPO राउंड में $100 मिलियन से ज़्यादा जुटाने की कोशिश कर रही है और जिसकी वैल्यूएशन $700 मिलियन आंकी जा रही है, उसने FY25 में ऑपरेटिंग EBITDA प्रॉफिटेबिलिटी हासिल कर ली है। यह 2027 में संभावित लिस्टिंग से पहले फाइनेंशियल हेल्थ पर मज़बूत फोकस को दर्शाता है। यह प्रॉफिट पर ज़ोर, Practo की 2020 की फंडिंग से बिल्कुल उलट है, जिसमें उसकी वैल्यूएशन 50% से ज़्यादा घट गई थी।
नए स्टार्टअप युग के जोखिम
इस नए अप्रोच में असली चुनौतियां काफी बड़ी हैं। भारतीय IT सेक्टर को पहले ही एक साफ़ चेतावनी मिल चुकी है। Nifty IT इंडेक्स 2026 की शुरुआत से लगभग 25% गिर गया है, जिससे लगभग ₹7.7 लाख करोड़ का मार्केट वैल्यूएशन नुकसान हुआ है। यह गिरावट AI द्वारा पारंपरिक आउटसोर्सिंग बिज़नेस मॉडल को पूरी तरह से बदलने के डर के कारण आई, जो दिखाता है कि कैसे खतरा जल्दी ही बड़े वैल्यूएशन ड्रॉप्स का कारण बन सकता है।
स्टार्टअप्स के लिए, "AI डेथ वैली" (AI Death Valley) एक बड़ा जोखिम है, जहाँ आकर्षक AI प्रोजेक्ट्स इंटीग्रेशन और डेटा की कमी के कारण बढ़ने में संघर्ष करते हैं। डिजिटल एज में डीप कंज्यूमर ट्रस्ट बनाने में भी काफी समय और पैसा लगता है, जहाँ 77% भारतीय ऑनलाइन खरीदार अभी भी डेटा ब्रीच को लेकर चिंतित हैं। जो कंपनियां AI पर ज़्यादा खर्च करने और ट्रस्ट बनाने के बावजूद प्रॉफिटेबिलिटी का स्पष्ट रास्ता नहीं दिखा पातीं, वे इन्वेस्टर के संदेह और वैल्यूएशन ड्रॉप का सामना कर सकती हैं, जैसा कि Practo के इतिहास से पता चलता है। असली लोकल रीच के लिए कॉम्प्लेक्स ऑपरेशंस, साथ ही पूरी जांच और ग्राहक सहायता की ज़रूरत, मुनाफ़े पर महत्वपूर्ण दबाव डालती है।
आगे का रास्ता
मुख्य बात बिल्कुल स्पष्ट है: AI एक मज़बूत बूस्टर का काम करता है, लेकिन भारत के बदलते स्टार्टअप सेक्टर में स्थायी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां कितना गहरा कंज्यूमर ट्रस्ट बना पाती हैं, लोकल लेवल पर कितना परफेक्टली ऑपरेट कर पाती हैं, और प्रॉफिटेबिलिटी का एक स्पष्ट रास्ता दिखा पाती हैं। जैसे-जैसे स्टार्टअप सीन परिपक्व हो रहा है, निवेशक ज़्यादा बारीकी से जांच करेंगे। वे उन कंपनियों को तरजीह देंगे जो टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन को अच्छे फाइनेंशियल मैनेजमेंट और वास्तविक ग्राहक निष्ठा (customer loyalty) के साथ जोड़ सकें।
