भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम अब कंज्यूमर ऐप्स से हटकर AI और सेमीकंडक्टर जैसे डीप टेक सेक्टर की तरफ शिफ्ट हो रहा है। इसके लिए **$25 बिलियन** का एक बड़ा फंड तैयार किया गया है, जो इस बदलाव को गति देगा।
भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब फोकस फिनटेक और ई-कॉमर्स जैसे कंज्यूमर-आधारित प्लेटफॉर्म्स से हटकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स, एडवांस्ड मटेरियल और सेमीकंडक्टर्स जैसे डीप टेक्नोलॉजी क्षेत्रों पर शिफ्ट हो रहा है। यह लॉन्ग-टर्म इंडस्ट्रियल कैपेबिलिटी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
निवेश का डेटा क्या कहता है?
2015 से 2026 के बीच, इस सेक्टर ने लगभग $11.4 बिलियन का वेंचर कैपिटल निवेश आकर्षित किया है, जिसमें केवल 2025 में $2.96 बिलियन का रिकॉर्ड निवेश आया। इस ग्रोथ को सहारा देने के लिए $25 बिलियन का एक फंडिंग पूल बनाया गया है। इसमें सरकार के Research Development Infrastructure Fund से $11 बिलियन और बाकी निजी निवेश शामिल हैं। इसका उद्देश्य 'पेशेंट कैपिटल' (Patient Capital) उपलब्ध कराना है, ताकि जटिल हार्डवेयर बनाने में आने वाले समय और जोखिम को संभाला जा सके।
प्राइवेट एयरोस्पेस की बड़ी सफलता
हालिया सफलताओं ने यह साबित कर दिया है कि यह कैपिटल सही दिशा में काम कर रही है। जुलाई 2026 में Skyroot Aerospace ने अपने Vikram-1 रॉकेट की पहली ऑर्बिटल फ्लाइट पूरी की। यह भारत में किसी प्राइवेट कंपनी द्वारा घरेलू जमीन से किया गया पहला ऑर्बिटल लॉन्च था, जिसने यह दिखा दिया कि भारतीय कंपनियां ग्लोबल स्तर पर टक्कर लेने को तैयार हैं।
क्या हैं रिस्क और चुनौतियां?
डीप टेक में निवेश का उत्साह तो है, लेकिन यहां जोखिम भी काफी ऊंचे हैं। ई-कॉमर्स के विपरीत, जहां मार्केटिंग के दम पर बिजनेस बढ़ जाता है, डीप टेक को रिसर्च और टेस्टिंग पर भारी-भरकम खर्च की जरूरत होती है। सबसे बड़ी समस्या 'सीरीज B और C' फंडिंग के स्तर पर आती है, जहां कंपनियों को कमर्शियल लेवल पर जाने के लिए फंड जुटाने में संघर्ष करना पड़ता है।
भारत का कॉर्पोरेट रिसर्च खर्च अभी भी GDP का केवल 0.64% है, जो विकसित देशों के मुकाबले बहुत कम है। साथ ही, फुल-स्केल चिप मैन्युफैक्चरिंग के लिए अभी भारत में एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार होने की प्रक्रिया में है। फिलहाल भारत में 4,200 से ज्यादा डीप टेक स्टार्टअप सक्रिय हैं, लेकिन असली परीक्षा यह है कि क्या वे सरकारी रिसर्च को कमर्शियल प्रोडक्ट्स में बदल पाएंगे या नहीं।
