भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम **₹13.5 लाख करोड़** के एसेट्स तक पहुंच गया है, लेकिन अब फंड की जगह 'अनुभव' की कमी एक बड़ी चुनौती बन गई है। निवेशक अब केवल तेजी से बढ़ते बिजनेस नहीं, बल्कि मैच्योर मैनेजमेंट वाले स्टार्टअप्स को प्राथमिकता दे रहे हैं।
भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। मार्च 2025 तक इस सेक्टर का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹13.5 लाख करोड़ के स्तर को छू चुका है। टियर-2 शहरों में 1,100 से ज्यादा इनक्यूबेटर्स के साथ, अब स्टार्टअप्स के लिए फंड की कमी कोई बड़ी बाधा नहीं रही। इसके बजाय, मार्केट अब एक 'विजडम गैप' (अनुभव की खाई) से जूझ रहा है, जहां प्रोडक्ट बनाने की क्षमता तो है, लेकिन सस्टेनेबल बिजनेस चलाने की रणनीति का अभाव है।
प्रोडक्ट के आगे भी है चुनौतियां
कई शुरुआती कंपनियां प्रोडक्ट डेवलपमेंट के बाद ऑपरेशन्स को संभालने में लड़खड़ा जाती हैं। मुख्य समस्या टेक्निकल एक्सपर्टाइज और फाइनेंस, एचआर (HR) और गवर्नेंस को संभालने के तालमेल में आती है। जब फाउंडर्स केवल तेजी से ग्रोथ पर ध्यान केंद्रित करते हैं और फाइनेंशियल डिसिप्लिन को नजरअंदाज करते हैं, तो बिजनेस का फेल होना तय हो जाता है।
अब 'ग्रोथ एट एनी कॉस्ट' का दौर खत्म
इस बदलाव के बीच, निवेशक अब ऐसे फाउंडर्स को ढूंढ रहे हैं जो प्रोफेशनल सलाह लेने में संकोच न करें। फ्रैक्शनल सीएफओ (CFOs) और अनुभवी ऑपरेशंस लीडर्स की मांग तेजी से बढ़ रही है। अब 'ग्रोथ एट एनी कॉस्ट' की सोच की जगह 'इंस्टीट्यूशनल रिगर' (संस्थागत सख्ती) ने ले ली है। मेंटरशिप अब कोई बाहरी चीज नहीं, बल्कि सफलता के लिए अनिवार्य शर्त बन गई है।
निवेशकों का नजरिया
देश की इकोनॉमी के लिए स्टार्टअप्स का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे तकनीकी वेंचर से निकलकर एक टिकाऊ संस्थान (Enduring Institution) कैसे बनते हैं। आने वाले समय में स्टेकहोल्डर्स का पूरा ध्यान इथिकल फ्रेमवर्क और इनक्यूबेटर्स की गुणवत्ता पर होगा। निवेशक अब इस बात पर नजर रखेंगे कि स्टार्टअप्स अपनी मैनेजमेंट स्टाइल को लंबे समय तक टिकने लायक कैसे बनाते हैं।
